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सांप्रदायिकता के घोर विरोधी थे विद्यार्थी

25 मार्च 1931 की अहिंसा के पुजारी क्रांति के प्रबलतमसमर्थक, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, शोषितों, गरीबों के मसीहा, कलम के निर्भीकतमयोद्धा, जो अत्याचार के समक्ष कभी नहीं झुके, उच्च कोटि के राजनेता और प्रख्यात पत्रकार, महान त्यागी अडिग और नितांत स्पष्टवादी,
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ऐसी है, आज की नारी

जब से ब्लॉगजगत में शामिल हुई हूँ, अपनी सहेली द्वारा वर्णित इस घटना के विषय में लिखने की सोच रही थी. और आज महिला दिवस के अवसर पर इसका जिक्र सबसे उपयुक्त लगा.पहले अपनी सहेली का संक्षिप्त परिचय दे दूँ. (परिचय क्यूँ जरूरी है,आपको आगे पता चल जायेगा) .
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सीमा आज़ाद की गिरफ्तारी : लोकतन्‍त्र का लबादा खूंटी पर, दमन का चाबुक हाथ में

ज़रूरी नहीं फ़ासीवाद केवल धर्म का चोला पहनकर ही आए, वह लोकतन्‍त्र का लबादा ओढ़कर भी आ सकता है। और ऐसा हो भी रहा है। चुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद कई लोगों ने खुशी जाहिर की थी और उन्‍हें लगा था कि चुनावों ने फासिस्‍ट भाजपा को हाशिये पर धकेल दिया है।
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दो दशक बाद किया बस का सफर

बस के अंदर से खींची गई सड़क की एक तस्वीर हमें कल बस का सफर करने का मौका मिल गया। यह सफर वास्तव में सुहाना रहा। हमें बस में सफर करने का मौका करीब दो दशक बाद मिला था। वैसे बस में जाना कमोवेश हम पसंद नहीं करते हैं, जहां जाते हैं अपनी मोटर सायकल या फिर क
 
राजकुमार ग्वालानी
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पत्रकार यानी लोकतंत्र का चौथा धब्बा...

मामा खबरुद्दीन से पार पाना बेहद कठिन होता है, लेकिन उस दिन मामा घर पर नहीं थे। उनका बेटा मोनू राम मिल गया। बोला, 'भइया, ये बुद्धिजीवी लोग कौन होते हैं?' दिल ने कहा, कहीं मामा की जगह आज उनके बेटे से तो मुठभेड़ नहीं हो जाएगी, दिमाग बोला, हो भी गई तो इस
 
प्रभात गौड़
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आप समझते क्यों नहीं? हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं है…

दिन भर राष्ट्रभाषा के अपमान की धुन बजती रही. एक पूरी फौज है जिसके सीने पर साँप लौट गए. प्रतिक्रिया करने वाले भी पत्रकार बिरादरी के ही लोग है, जिन्हे बुद्धिजीवी भी कहा जाता है.
 
संजय बेंगाणी