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किसी भी स्थिति में धैर्य मत खोना . . बेटी को माँ का ख़त

अभिभूत हूँ मैं तुमने जो सन्देश मातृ दिवस पर मुझे दिया है. आज भी जब याद करती हूँ उन क्षणों को जब मैनें मातृत्व सुख अर्जित किया था तो रोमांचित हो जाती हूँ. और यह मातृत्व सुख तुमने ही तो प्रदान किया था - सर्वप्रथम. ऊँगली पकड़कर तुम्हें चलना सिखाने से लेकर अब
 
Razia
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हंस के सम्पादक राजेन्द्र यादव के नाम एक पत्र

हंस का मार्च अंक पढ़ने के बाद राजेन्द्र जी नमस्ते,आपके सानंद होने की कामना करता हूँ.सबसे पहले तो हंस ऑनलाइन करने पर आपको बहुत सा आभार एक तरफ सरकारी जमाइयों के आठ प्रतिशत महंगाई भत्ता बढ़ गया है,दूजी और महानरेगा के मजदूर उसी मजदूरी के साथ इस खबर से बेखबर
 
माणिक
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एक मित्र को पत्र

प्राथमिक शाला में एक मित्र को पत्र लिखना था लिखा किन्तु बेहद त्रुटी पूर्ण होने से मुझे दंड मिला पत्र आज पूरा कर रहा हूँ शायद आप को पसंद आये
 
गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल'
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एक ख़त सनम का

कम्युनिकेशन के युग मे ख़त इत्तेफाक हो गए हैं, अब तो मोबाइल, बैंक खाते के ब्यौरे और कई ज़ुरूरी कागज़ भी इ-मेल के जरिये ही आया करते हैं.. पहले कुछ और ही मज़ा था , ऐसा कहते हैं, मगर मुझे लगता है, की अभी भी पोस्ट ओफ्फिसस और कुरिएर का अहम् स्थान है, ख़त लिख
 
राकेश जैन
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वर्तमान के सिरे

कुल् ‍ लू (हिमाचल प्रदेश) से ए ‍ क पत्रिका शुरू‍ हुई है , असिक् ‍ नी। सपांदकों को मैंने प्रतिक्रिया लिखी। इधर कथादेश में बद्रीनारायण का साहित् ‍ य का वर्तमान लेख छपा। बात को आगे बढ़ाने के लिए मैंने यह पत्र कथादेश को भेजा जो अक् ‍ तूबर अंक में छपा है।
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अदला-बदली

वाणी जी के कहने पर असुविधाजनक तमाम शेड्स हटा दे रहा हूँ शुक्रिया वाणी गीत जी खालिस चाहत एक कहानी हैं जो कविता की तरह सुनानी हैं ,सात बच्चे साथ-साथ खेलते-कूदते ,लड़ते -झगड़ते ,धमाचौकड़ी जमाते ,चिल्लाचौट करते ,आपस में बचपन की अदला-बदली कर सबको हैरान कर देते
 
आदित्य आफ़ताब "इश्क़"
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ये कहाँ आ गये हम...

खालील लेख मी 'मनोगत'वर १७-०३-०७ रोजी सुपूर्त केला होता. प्रशासकांना व्यक्तिगत निरोप नव्हे तर 'धोरण, विचार' या सदराखाली एक लेख म्हणून. अपेक्षेप्रमाणे त्यांनी तो प्रकाशित केला नाही, परंतु त्याच दिवशी त्यांनी मला व्य. नि. पाठवून त्यांची बाजू मांडली. त्यांनी