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आंग्‍स्‍ट..

पता नहीं यह आंग्‍स्‍ट मुझे कहां ले जाएगी. जबकि आईपीएल से मेरा कुछ लेना भी नहीं. न पूर्णा पटेल या सुप्रिया सुले से है. लेना. वो चाहें भले मुझे कुछ दे दें, मुझे उनको नहीं देना. एमसीआई (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) तक से मेरे गुप्‍त या प्रकट किसी तरह के संबंध
 
Pramod Singh
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बच्‍ची और मैं और धू-धू जलता दिन..

बच्‍ची फिर आकर अपने पोज़ीशन पर खड़ी हो गई है और आंखें फाड़े मुझे घूर रही है! अरे, इसे कोई रोकेगा नहीं? शरीफ़ों के मुहल्‍ले में ये क्‍या तमाशा है! (ठीक है कि मुहल्‍ले में मैं भी रहता हूं, मगर मुहल्‍ला शरीफ़ ही है. बच्‍ची के घरवाले तक शरीफ़ लोग हैं. बच्‍ची
 
Pramod Singh
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कमस्‍तर, कनस्‍तर भर..

साइकिल पर भारी कनस्‍तर बांधे थे (तेल था क्‍या था?) उसी की थकान रही होगी, हांफते, एक खंभे साइकिल टिकाकर वहीं सड़क के कोने बैठ गए, मैंने एकदम चीख़कर कहा, क्‍या गजब करते हैं, बाबूजी, ऐसे ही सड़क पे बैठ रहे हैं? कोई देखेगा क्‍या सोचेगा? हमीं देख रहे हैं,
 
Pramod Singh
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आ मेरे हमजोली आ, बरजोरीये आ!

क्रि‍समस आ रहा है. आ क्‍या रहा है लगभग सिर पर खड़ा है (कुछ भेंट-सेंट लेकर नहीं आया है घंटा, बट दैट्स अनादर स्‍टोरी. बट दैट्स ऑल्‍सो फ़नी कि देयर इज़ ऑल्‍वेस वन अनादर स्‍टोरी , नहीं?). क्रि‍समस निकलेगा नहीं कि बाबू नवका साल दांत चियारे, सवालों का झोला
 
Pramod Singh
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इतिहास-चक्‍कर, या व्‍हॉटेवर..

देह का सत्‍य-तत्‍व कहां बसता है, प्रभु? और अंधेरे वन में अंधेरी आंख, कैसे तकती है?’ कल्‍पना के जापानी मांगाओं में उलझे ऋषिपुत्र सुकुमार तपोधन विशाखकुसुम प्रश्‍न करें, व प्रश्‍नोपरांत लम्‍बी सांस लेने का अवकाश टटोल रहे ही हों, कि जो साक्‍को की ग्राफ़ि
 
Pramod Singh
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महाजनी पथ की घिसटती सांझ पर लड़का-लड़की..

हाथ में हाथ नहीं था लेकिन लड़का, लड़की साथ थे और चले जा रहे थे. चूंकि कथा है और लातखाये प्रदेश की पिटी हुई ज़बान के रंजन हेतु है, आगे ठिलने के लिए लड़की और लड़के का चयन ही अभीष्ठ था. और अच्छा था कमसिन, कोमलांगी थे, चालीस से ऊपर के होते उससे कथा के स्
 
Pramod Singh
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भर-भर घर..

घर में पड़े-पड़े चट गया हूं. चार दिनों से इन तंग दीवारों के बीच क़ैद हूं और अब लगता है मेरी खुद की सांसें आपस में टकरा रही हैं. देह भी पिटी आवाज़ में शिकायत करता है कहीं बाहर टहलाओ, भाई, हाथ-पैर चलवाओ? तुम्‍हारी संगत में लगता है अलेंदे से उलट गयी अर्
 
Pramod Singh
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टू इज़ टू मच..

जर्मनी का कोई छोटा शहर. छोटे शहर के दो छूटे हुए बेरोज़ग़ार. एक सूखे बांस की तरह उजड़ा-उखड़ा, दूसरा गराज के पिछाड़े जाने किस ज़माने से भूल गये पुराने मॉडल के वॉल्‍क्‍सवागन की तर्ज़ पर तानपूरे का तूंबा. बेबात की हंसते, बेबात माचिस की तीली जलाते, बेबात
 
Pramod Singh
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साहित्‍य बीहड़ रत्‍नाकर..

स्‍पैन ’ पलटने के बाद ‘ एल नुवोबो मोंदो ’ के पन्‍ने पलटता हूं. कल ही दफ़्तर में आ गयी थीं लेकिन देख सकने की फ़ुरसत नहीं बनी (यही दिखता रहा कि मेरे नाम विदेशी पत्रिकाओं के आने से कैसे सोढी एंड पार्टी की आंतें जलती हैं! जलती है दुनिया जलती रहे, आंखें अ
 
Pramod Singh
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सांवली रुपाली की तीन तुकबंदियां.. क्षमा करें इन्‍हें कविता मानने से पतनशील संपादक मंडल गुरेज करेगा..

तुम्‍हारी यादों में रेगिस्‍तान के प्‍यासे को जैसे गांव का कुंआ याद आता है लुटे व्‍यापारी को याद आयेगी ईश्‍वर की फिंकी, फाड़ी तस्‍वीर जब सारे मेले चुक लेंगे जब रात अंधेरी काली गाढ़ी होगी आऊंगी तुम्‍हारी यादों में खोयी टिमटिमाती एक लक़ीर। अन्‍तर की चाह
 
Pramod Singh