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एक राह और

नूर संतोखपुरी वह मेरे आगे-आगे चली जा रही थी। गले में पड़ी हलके लाल रंग की चुनरी के दोनों छोर मेरी ओर देख कर हंस रहे थे। बालों की एक ही चोटी इस तरह गुंथी हुई थी, जैसे किसी ने बलखाती बेल कोरे सफेद कागज पर बड़ी रीझ से बनाई हो। उसके कानों की सुनहली बालिय
 
दीपशिखा