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सामर्थ्यवान् व्यक्ति ‘पापी’ पर नियंत्रण रखे – महाकाव्य महाभारत के और्व ऋषि प्रकारण में वर्णित नीति

महाकाव्य महाभारत में और्व नामक भृगुवंशी ऋषि से संबद्ध एक प्रकरण है । उसके अनुसार एक बार क्षत्रिय लोग धर्मविरुद्ध व्यवहार करते हुए अकारण भृगुवंशियों को सताने और उनका संहार करने लगे । उनके आचरण से कुपित हो ऋषि और्व ने स्वयं उनका विनाश करने का संकल्प ले
 
योगेन्द्र जोशी
टैग: नीति
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यावत् जीवेत् सुखं जीवेत् …: चार्वाक दर्शन (लोकायत)

मानव जीवन का सबसे प्राचीन दर्शन (philosophy of life) कदाचित् चार्वाक दर्शन है, जिसे लोकायत या लोकायतिक दर्शन भी कहते हैं । लोकायत का शाब्दिक अर्थ है ‘जो मत लोगों के बीच व्याप्त है, जो विचार जनसामान्य में प्रचलित है ।’ इस जीवन-दर्शन का सार निम्नलिखित
 
योगेन्द्र जोशी
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चीन के सामने चींटी है भारत

कभी नहीं सोचा था कि दिल्ली के बीचों-बीच स्थित भारत का शो-पीस एग्जेबिशन सेंटर प्रगति मैदान चीन को लेकर हमें इतना कड़ा संदेश देगा। कुछ साल पहले तक यह भारत की उपलब्धियों को बाहरी दुनिया के सामने प्रदर्शित करने का काम करता था। यहां की इमारतें, पविलियन सब
 
राजेश कालरा
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कठोपनिषद् के नीति वचन – श्रेयस् (कल्याणप्रद) एवं प्रेयस् (चित्ताकर्षक) में चुनाव

कठोपनिषद् में ऋषिकुमार बालक नचिकेता और यम देवता के बीच प्रश्नोत्तरों की कथा का वर्णन है । नचिकेता की शंकाओं का समाधान करते हुए यम उपदेश देते हैं कि मनुष्य दो प्रकार के कर्मों से बंधा रहता है, प्रथम वे जो कल्याणकारी होते हैं और द्वितीय वे जो उसको प्रि
 
योगेन्द्र जोशी
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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् और राजधर्म – प्रजासुखे सुखं राज्ञः …

आचार्य चाणक्य के नाम से प्रायः हर भारतवासी परिचित होगा । उन्हें अवसर के अनुरूप हर प्रकार की नीति अपना सकने वाले एक अतिसफल राजनीतिज्ञ के तौर पर जाना जाता है । उनका काल चौथी सदी ईसवी पूर्व बताया जाता है । वे तत्कालीन यूनानी शासक, सिकंदर महान, के समकालीन
 
योगेन्द्र जोशी
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‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ इत्यादि – मनुस्मृति के वचन

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते …’ कहते हुए समाज में स्त्रियों को सम्मान मिलना चाहिए की बात अक्सर सुनने को मिलती हैं । सम्मान तो हर व्यक्ति को मिलना चाहिए, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, बालक हो या वृद्ध, धनी हो या निर्धन, आदि । किंतु देखने को यही मिलता है
 
योगेन्द्र जोशी
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बुद्धवचनामृत, अश्वघोषविरचित बुद्धचरितम् से – ऐहिक संबंधों का अस्थायित्व

प्राचीन संस्कृत साहित्य में ‘बुद्धचरितम्’ नामक एक काव्य उपलब्ध है । मेरे पास इसकी एक प्रति है, श्री सूर्यनारायण चौधरी द्वारा संपादित-अनुवादित एवं मोतीलाल बनारसीदास द्वारा प्रकाशित । ग्रंथ-परिचय में बताया गया है कि काव्य की पूरी मूल प्रति उपलब्ध नहीं है ।
 
योगेन्द्र जोशी