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मसला यह भी हल हो जायेगा।

ठोस भी कभी तरल हो जायेगा मसला यह भी हल हो जायेगा।फ़ागुन का रंग जो चढा कभीचैती बैरागी विकल हो जायेगा।सच एक था और रहेगा एक परअमृत तो कभी गरल हो जायेगा।पहले से जो तुमने की तैयारियांजीवन का पर्चा सरल हो जायेगा।पाकर संग फूलों का एक दिनकांटा भी कोमल हो जायेगा
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मुक्तेश्वर:7 जुलाई 1976/निर्मल वर्मा

निर्मल वर्मा की दूसरी दुनिया से- पढ़ने का खास सलीका न होते हुए भी अपने स्पेस में इस अंश को स्वर में सहेजने का मन हुआ… मुक्तेश्वर:7 जुलाई 1976हमें उन चीज़ों के बारे में लिखने से अपने को रोकना चाहिए ,जो हमें बहुत उद्वेलित करती हैं ,जैसे - बादलों में बहता हुआ