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अब तो अपनी लेखनी से, नाड़ा ही तू डाल रे!

पिछले दिनों पुण्य प्रसून जी के ब्लोग में, मीडिया के गिरते स्तर पर पाकिस्तानी कवि “हबीब जालिब” की कविता पढी, “अब क़लम से इज़ारबंद ही डाल”...मूल कविता उर्दू में थी और उसका हिन्दी अनुवाद शायद! प्रसून जी ने किया था. मुझें कविता जितनी जानदार और बेबाक लगी उसका
 
सम्वेदना के स्वर
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