यदि निरूपमा का परिवार इतना ही दृढ़ था कि निरूपमा को महानगर में होते हुए भी कुछ ऐसा वैसा करने की हिमाकत नहीं करनी चाहिए थी तो आखिर क्यों नहीं उसे वहीं अपने शहर में ही कोई टीचर, टेलर की नौकरी दिलवाने में दिलचस्पी दिखाई। यदि निरूपमा को दिल्ली भेजा भी तो उसे
बड़े पर्दे पर ग्लैमर, चमक के नाम पर नारी के शरीर से एक एक वस्त्रा उतारकर उसे ’प्राकृतिक अवस्था‘ तक पहुंचाया जा रहा है। उसके शरीर के अंतरंग भागों तक कैमरों की पहुंच लगातार बढ़ी है जो आज नारी के लिए चिंता का विषय बनकर रह गई है
आपरेशन थियेटर की बत्ती आन हो गई। अमित बेंच पर बैठा देखने लगा-बत्ती की रोशनी से लाल साड़ी पहने कनी बाहर आ रही थी, डलिए में एक-एक कदम रखती उसके घर में प्रवेश कर रही थी कि श्यामली ने रास्ता रोक लिया।
आधी रात गए, नन्हा रीसा, जीवन की एक पूरी मंजिल एक दिन में लांघकर, सिर के नीचे ब्रुश और पालिश की डिब्बिया और एक छोटा-सा चीथड़ा रखे, उसी बराण्डे की छत के नीचे अपनी यात्रा के नये साथियों के साथ, भाग्य की गोद में सोया पड़ा था।