पसंद करें
1
नापसंद करें

अब आँखों में नही सैलाब कोई

अब आँखों में नही सैलाब कोई मुझे लौटा दे मेरे ख्वाब कोई अजब मजबूरिया थी चुप रही मै मुझे करता रहा आदाब कोई मै तूफानों से बचना चाहती थी मगर दरिया न था पायाब कोई नसीम निकहत
 
Rahul kundra
पसंद करें
1
नापसंद करें

फ़िर अजनबी फिजाओ से जोड़ा गया मुझे

फ़िर अजनबी फिजाओ से जोड़ा गया मुझे मै फूल थी जो शाख से तोडा गया मुझे मिटटी के बर्तनों की तरह साडी जिंदगी तोडा गया मुझे कभी जोड़ा गया मुझे हाथो में सौप कर मेरे कागज़ की एक नाव दरिया के तेज़ धार पर छोडा गया मुझे खुशबू की तरह जीना भी आसान तो नही फूलो से कत
 
Rahul kundra
पसंद करें
2
नापसंद करें

तमाम रिश्तो से इंकार करना चाहते है

तमाम रिश्तो से इंकार करना चाहते है हम अपनी जात को दिवार करना चाहते है हमारी जिंदगी जीना कोई मजाक न था सो हम तुम्हे भी ख़बरदार करना चाहते है अजीज़ मिलने लगे है बड़े खलूस के साथ ये लोग कोई नया वार करना चाहते है नसीम निकहत
 
Rahul kundra