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जवानी

सूखे हुवे दरख़्त सी मेरी जवानी है , हलाकि गांव की नदी मेरी लगानी है |दिल की गली में जंगली फूलों की खुशबू है , पर मंदिरों से दूर मेरी जिंदगानी है|तू इश्क की ज़मीं को बदनाम कर चुकी , मेरी वफ़ा की दास्ताँ पर आसमानी है|मै चाँद के घराने से लाया हूँ इक बहू,
 
ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι
टैग: नदी
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कसा आहे हा ऋतु…

कसा आहे हा ऋतु की ज्यात… फ़ुल होवुन हृदय फ़ुलले मिसळत आहेत रंग सारे मिसळत आहेत सुगंध सारे मेघ,चांदण्या आणी झरे गीत,पाउस ,फ़ुलपाखरे सगळे झाले आहेत आपल्यावर मेहरबान… बघा नदीच्या किनारी पक्षी पुकारतो कोण्या पक्ष्याला बघा ही जी नदी आहे भेटायला चालली
 
देवेंद्र चुरी
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मृगेन्द्र प्रताप सिंह का शिल्प : डॉ. लोलार्क द्विवेदी द्वारा समीक्षा

[ वरिष्ट कला समीक्षक एवं ’आर्यकल्प ’ के सम्पादक डॉ. लोलार्क द्विवेदी ने मृगेन्द्र प्रताप सिंह की इस शिल्प कृति पर लिखी जीवन्त समीक्षा को छापने की अनुमति सस्नेह दी है । आभार । ] … और अभी मीलों चलना है मृगेन्द्र प्रताप सिंह ( प्राध्यापक , मूर्तिकला
 
अफ़लातून