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अक्स

उस रात जब कुछ संजीदा शिकायतें अपने खुश्क लबों पे लिए मेरे कमरे पर तुम आई थी.. और बिस्तर पर चादर की चंद सिलवटों के दरमियाँ बिखरे उन तमाम तनहा लम्हों को बिना पीछे देखे समेट ले गई थी.. तुमको शायद नही पता.. एक चीज़ जो तुम भूल गई थी.. आज भी साहिल करीब जान
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
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कमरा

वो तस्वीर तिरछी है दीवार पे अब भीकॉफी के वो प्याले यूँ ही मेज पे रखे हैंना गयी हैं सिलवटें तेरे छुअन की अब तकना हटा है तेरी गर्म साँसों का वो दागतकिये में अब भी है तेरे गेसू की खुशबूबिस्तर से अब भी लिपटी है वो चादरज़ुम्बिश हर क़तरे में बाकी है कुछ ऐसेके
 
केतन कनौजिया 'शाइर'