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मौज-दर-मौज

मौज-दर-मौज इस वक्त की तल्खीयों का बोझ सबके शानों पर हैऐसे लम्हात में इम्तहाँ से  रोज रू-ब-रू होना पडता हैदरीचे दिल के जो, खोलोगे तो पाओगेछोटे-छोटे रोज़न नहीं इसमें बड़े-बड़े दर हैं यहाँ से तो दर्दों के काफ़िले गुज़र सकते हैं  इस मंज़र की
 
SURINDER RATTI
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फैज़ अहमद फैज़ की एक नज़्म

जन्मशताब्दी है इस साल फैज़ कीहम देखेंगे लाजिम है कि हम भी देखेंगेवो दिन कि जिसका वादा हैजो लौह-ए-अजल में लिखा हैजब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरांरुई की तरह उड़ जाएँगेदम महकूमों के पाँव तलेजब धरती धड़ धड़ धड़केगीऔर अहल-ए-हिकम के सर ऊपरजब बिजली कड़ कड़
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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शहज़ादा गुलरेज़ की नज्म

शहज़ादा गुलरेज़ की नज्मकहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़कीबहुत खूबसूरत मगर सांवली सीमुझे अपने ख्वाबों की बांहों में पा कर।कभी नींद में मुस्कुराती तो होगीउसी नींद में कसमसा-कसमसा करसरहाने से तकिया गिराती तो होगीवही ख्वाब दिन की मंडेरों पर आकरउसे दिल ही दिल में
 
shan
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कुछ बहके बहके से अल्फाज़....जाने किसके लिए

वो खामोश नज्में कहता था मेरे लिएमैं बदन के रोम रोम से सुना करती थीवो अपनी आँखों से सहलाता था मुझेमैं घूँट घूँट उसके इश्क को पिया करती थीवो कुछ अधूरी सी इबारत लिख गया था मेरी धडकनों परमैंने उन्हें अपना नाम पता बनाकर पूरा किया थावो किसी लैला की बात किया
 
pallavi trivedi
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ज़िन्दगी के सफ़र के अगले पड़ाव की ओर....

एक हफ्ते में सब कुछ बदल गया! सत्रह तारिख को ट्रांसफर ऑर्डर आया....कल यहाँ से रिलीव हो गयी और कल जाकर नयी जगह ज्वाइन करना है! डी.एस.पी. रेल भोपाल से अब सिटी एस. पी. विदिशा.......नयी जगह जाने की स्वाभाविक उत्कंठा और उत्साह भी है पर भोपाल छोड़ने का दुःख भी
 
pallavi trivedi
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जावेद अख्तर की एक प्यारी सी नज़्म

,अक्सर मेरे एक  ब्लॉग का मूड  दूसरे ब्लॉग पर भी परिलक्षित होता है, 'मन का पाखी' पर  कहानी ने कुछ गंभीर मोड़ लिया तो बैलेंस करने को यहाँ कुछ  हल्का फुल्का लिखना पड़ा.यहाँ निरुपमा के बहाने लड़कियों के प्रति माता-पिता की उदासीनता के विषय
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नज़्म .....कवि दीपक शर्मा

बात घर की मिटाने की करते हैंतो हजारों ख़यालात जेहन में आते हैंबेहिसाब तरकीबें रह - रहकर आती हैंअनगिनत तरीके बार - बार सिर उठाते हैं । घर जिस चिराग से जलना हो तोलौ उसकी हवाओं मैं भी लपलपाती है ना तो तेल ही दीपक का कम होता हैना ही तेज़ी से छोटी होती बाती
 
हिन्दी साहित्य मंच
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बादल

बादल एक निगाह झरोखे को चीरतीनिहारती बड़े  अदब सेदिल ही दिल में पुकारतीतिश्नगी  लबों पे लियेहलक सहलाते-सहलातेफलक़ की तरफ देखा उसनेआफताब अपनी पूरी ताक़त  के साथ तमाज़त बरसा रहा थाज़मीं तो तवे जैसी तप रही थी पांव रखते ही
 
SURINDER RATTI
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मौसम दहक रहा है...

मौसम दहक रहा है... आसमान से आग बरसातीसूरज की तेज़ किरणें...बदन को और झुलसाते लू के गरम झोंके...गुलमोहर की शाखों पर दहकते फूलों के सुर्ख़ गुच्छे...सूनी गलियों में बंजारन ख्वाहिशों-सी भटकती आवारा दोपहरें...दूधिया चांदनी मेंमोगरा-सी महकती सुलगती
 
फ़िरदौस ख़ान
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इश्क़

पता नहींये सज़ा हैया मज़ा है,कज़ा हैया रज़ा है,पता है तोकेवल,बिन इसकेसब बदमज़ा है,ख़ता है, गिला हैकि सिला है,न जानेये इश्क़ क्याबला है,जाने तो बसफ़स्ले ग़म हैचश्मे नम हैऔर दर्दे ज़ख़्म है,मगरशम्मे नूरानी हैहुक़्मे सुल्तानी है,सदाये आस्मानी हैजरिया भले जिस्मानी
 
निर्मल सिद्धु - हिन्दी राइटर्स गिल्ड
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बरसात का मौसम...

नज़्म गर्मियों का मौसम भीबिलकुल ज़िन्दगी के मौसम-सा लगता है...भटकते बंजारे-सेदहकते आवारा दिन औरविरह में तड़पती जोगन-सी सुलगती लंबी रातें...काश!कभी ज़िन्दगी के आंगन में आकर ठहर जाएबरसात का मौसम... -फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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कुछ यादें...

कुछ यादेंउन हसीं लम्हों कीअमानत होती हैंजब ज़मीन परचांदनी की चादर बिछ जाती हैफूल अपनी-अपनी भीनी-भीनी महक सेफ़िज़ा को रूमानी कर देते हैंहर सिम्त मुहब्बत का मौसमअंगराईयां लेने लगता हैपलकेंसुरूर से बोझल हो जाती हैंऔरदिल चाहता हैये वक़्त यहीं ठहर जाएएक पल मेंकई
 
फ़िरदौस ख़ान
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मुहब्बत का मौसम

वो नज़्मजो कभीतुमने मुझ पर लिखी थीएक प्यार भरे रिश्ते सेआज बरसों बाद भीउस पर नज़र पड़ती है तोयूं लगता हैजैसेफिर से वही लम्हें लौट आए हैंवही मुहब्बत का मौसमवही चम्पई उजाले वाले दिनजिसकी बसंती सुबहेंसूरज की बनफशी किरनों सेसजी होती थींजिसकी सजीली दोपहरेंचमकती
 
फ़िरदौस ख़ान
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गुलमोहर के दहकते फूल

सुलगती दोपहरी में खिड़की से झांकते गुलमोहर के दहकते फूल कितने अपने से लगते हैं...बिल्कुलहथेलियों पर लिखे 'नाम' की तरह...-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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तन्हाई का मौसम...

जबज़िन्दगी की वादियों मेंतन्हाई का मौसम होऔरअरमानपलाश से दहकते हों...तबनिगाहेंतुम्हें तलाशती हैं...जबकिदिल जानता हैतुम कभी नहीं आओगे...-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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सुलगते अहसास...

ज़िन्दगी के आंगन मेंमुहब्बत की चांदनी बिखरी है...हसरतों की क्यारी मेंसतरंगी ख़्वाबों के फूल खिले हैं...ख्वाहिशों के बिस्तर परसुलगते अहसास की चादर है...इंतज़ार की चौखट परबेचैन निगाहों के पर्दे हैं...माज़ी के जज़ीरे परयादों की पुरवाई है...फिर भीज़िन्दगी के आंगन
 
फ़िरदौस ख़ान
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वो आवारा

मंज़िलें तडपती रहीं, रास्ते मचलते रहे| वक्त पलट के देखता रहा, उस अवारे को .. उसकी शायद मंजिल ही तलाश थी.. रुसवा कर चुका था वो जज़्बात को… देखता था वो धुंद में तस्वीर कोई… उसकी फितरत ही थी रास्तों को नापने की… ख्यालों की दुनिया उसकी
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क्यों चलता है तू मेरे साथ

क्यों चलता है तू मेरे साथ … खो जा हवाओं में .. बिखर जा फिज़ाओं में .. मैं मौसम हूँ बीत जाऊंगा … अगले बरस मुझे तिनका तिनका जोड़ेगा तू … क्यों चलता है तू मेरे साथ … Filed under: नज़्म, Nazm, Prose Tagged: क्यों चलता है तू मेरे साथ
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चाहत का गुलाल

फागुन की मादक बेला में सुर्ख़ पलाश दहकता है...और ज़िन्दगी के रुख्सारों परचाहत का गुलालमहकता है...-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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इश्क़ का रंग

होली... मुझे बहुत अज़ीज़ है क्योंकि इसके इन्द्रधनुषी रंगों में इश्क़ का रंग भी शामिल है...-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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कोयले का अंगार

कोयले का अंगार देखा है.. कैसे तिनका तिनका जलके राख होता है| उसकी राख उस से लिपट कर, उसे ही भुझाने लगती है.. उसका अपना ही कुछ, उसकी घुटन बन जाता है.. उसे इंतज़ार है हवा के एक झोंके का.. कोयले का अंगार देखा है.. कभी भडकता, कभी घुटता .. उम्र भर जलकर,
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दरवाज़े सारे बंद हैं

कोई नहीं आएगा यहाँ, इजाज़त नहीं हैं| आज दरवाजे सारे बंद हैं … अंधेरा है ज़हन में, कमरे की रौशनी मद्धम है … आज दरवाजे सारे बंद हैं … मरासिम सारे यहाँ, सर झुका के खड़े हैं| आज इनका सामना मुझसे है| आज ये जवाब देंगे अपने खोखलेपन
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दहर

दहर राह-ए-दहर में   बातों के,  फसानें थे बहोत काली  रातों  में दिल में, अफ़साने  थे  बहोत    मेरी   मौजूदगी  में जो,  कतराते   रहते थे,जाने  के 
 
SURINDER RATTI
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माहताब

माहताब आज  चले  हैं वो फिर,  गुलशन को   मेहकानें,     बहारों का इस्तक़बाल करो, और छेड़ो तरानेहम  उनकी अदाओं   को   देख,  दंग रह गये, क्या नज़ारा  था,
 
SURINDER RATTI
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इंतज़ार

मेरे महबूब तुम्हारे इंतज़ार नेउम्र के उस मोड़ परला खड़ा किया हैजहां सेशुरू होने वाला एक सफ़रसांसों के टूटने परख़त्म हो जाता हैलेकिन-फिर यहीं से शुरू होता है एक दूसरा सफ़र जो हश्र के मैदान में जाकर ही मुकम्मल होता है...इश्क़ के इस सफ़र में मुझे ही तय करना
 
फ़िरदौस ख़ान
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इश्क़ का घूंट

एक कप कॉफ़ी...जिसका एक घूंट उसने पिया और एक मैंने लगा कॉफ़ी नहीं इश्क़ का घूंट पी लिया हो जैसे...-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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ज़िन्दगी भी तो देता है मारने वाला

नज़र से दिल में मुहब्बत उतारने वाला बहुत अजीज़ है मुश्किल में डालने वाला नयी सहर के दिलासों के बीच छोड़ गया हथेलियों से सूरज निकालने वाला चहार सम्मत से अब धूप के अज़ाब में है वो सायादार दरख्तों को काटने वाला तेरा करम जो नवाज़े तो मै भी बन जाऊँ इबादतों मे
 
shatrujit tripathi
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ये रिश्ता

कोई सच्चे ख्वाब दिखा कर आँखों में समा जाता है ये रिश्ता... ये रिश्ता क्या कहलाता है जब सूरज थकने लगता है और धूप सिमटने लगती है कोई अनजानी सी चीज़ मेरी साँसों से लिपटने लगती है मैं दिल के क़रीब आ जाती हूँ दिल मेरे क़रीब आ जाता है ये रिश्ता क्या कहलाता है
 
विभावरी रंजन
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ज़रा सा मुस्कुराओ ना

गमों की जो फ़सील है वह इस क़दर तवील है ग़ज़ब तो ये है यह एक नहीं फ़सील दर फ़सील है तुम इसकी हर मुंडेर पर आरजूओं के तेल से चरागे दिल जलाओ ना ज़रा सा मुस्कुराओ ना वो फ़िर से याद आ गया जो रूठ कर चला गया उसे ख़याल भी नहीं किसी का दिल दुखा गया अब उसकी मीठी
 
विभावरी रंजन
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डरते हैं हर चराग़ की रौशनी से हम

रखते नहीं हैं बैर किसी आदमी से हम फ़िर भी हैं अपने शहर में अजनबी से हम देखा है जलते जबसे ग़रीबों का आशियाँ डरते हैं हर चराग़ की रौशनी से हम हम बोलते नहीं तो समझो न बेज़बान हैं अपने घर की बात कहें क्यूँ किसी से हम तेरी खुशी का आज भी इतना खयाल है लेते नहीं
 
विभावरी रंजन
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वो कौन था ?

पसपाई की खिफ़्फ़त का असर काट रहा है मेरी तस्वीर का सर काट रहा है ज़ालिम तुझे ये भी नही मालूम की अब तक कोई तेरे हिस्से का सफ़र काट रहा है ये बात अलग है कोई मक़सद ना हो हासिल हर शख्स को हर शख्स मगर काट रहा है वो अपनी निगाहों के इशारे से बराबर हर देखने
 
विभावरी रंजन
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ये छोटा बच्चा

कितना खु़श है माँ की गोद में छोटा बच्चा ये बहुत दूर है गुनाहों की लज़्ज़त से अभी अभी इसने झूठ बोलना नहीं सीखा न ये जानता है अपना मज़हब न इसने लोगों को लड़ते देखा है न इसने बेइमानी देखी न इसने नफ़रत,न जुल्म,न ग़द्दारी देखी अभी ये दुनियादारी नहीं समझता अभी
 
विभावरी रंजन
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अजब सुरूर मिला है

अजब सुरूर मिला है मुझको दुआ करके के मुस्कुराया है खुदा भी सितारा वा करके गदागरी भी एक अस्लूबे फन है जब मैंने उसी को माँग लिया उससे इल्तिजा करके शब्बे फ़िराक़ के ज़ब्र को शिक़स्त हुई के मैने सुबह तो कर ली खुदा खुदा करके यह सोच कर कि कभी तो जवाब आएगा मै
 
विभावरी रंजन
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ये रिश्ते भी कितने अजीब होते हैं

आज बरसों बाद तुम्हे देखा अच्छे लग रहे थे काली टीशर्ट और जींस में पर तुम्हे कह भी न पायी बस...यादें खींच कर ले गयीं बीते दिनों में अभी कल की ही तो बात थी तुम शामिल थे मेरी ढलती शामों और उनींदी रातों में हमारी ख्वाहिशों ने साथ ही तो मचलना सीखा था याद ह
 
pallavi trivedi
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तेरी याद का एक पौधा

अपने दिल के गुलशन में मैंने रोपा था तेरी याद का एक पौधा मोहब्बत की खाद अश्कों के पानी से सींच सींच कर पाला बड़े प्यार से आज बड़ा हो गया है मेरा ये पौधा देख,कितने फूल आये हैं इसमें और तू बिखर गयी है फिजा में खुशबू बन के..... जाते जाते समेट ली थी तुम्ह
 
pallavi trivedi
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वो नज़्म...

वो नज़्म जो कभी तुमने मुझ पर लिखी थी एक प्यार भरे रिश्ते से आज बरसों बाद भी उस पर नज़र पड़ती है तो यूं लगता है जैसे फिर से वही लम्हें लौट आए हैं वही मुहब्बत का मौसम वही चम्पई उजाले वाले दिन जिसकी बसंती सुबहें सूरज की बनफशी किरनों से सजी होती थीं जिसकी स
 
फ़िरदौस ख़ान
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सजदा...

दुनिया इसे शिर्क कहे या गुनाहे-कबीरा मगर यह हक़ीक़त है दिल ने एक सजदा तुम्हें भी किया है और तभी से मेरी रूह सजदे में है... -फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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ख़त...

ख़त... दूधिया वरक़ों पर लिखे ज़ाफ़रानी हर्फ़ उसने काग़ज़ पर नहीं मेरी रूह पर टांक दिए थे... -फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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मन्नतों के पीले धागे

बस्ती से दूर किसी खामोश मक़ाम पर बने दूधिया मज़ारों के पास खड़े दरख्त की शाखों पर बंधे मन्नतों के पीले धागे कितने बीते लम्हों की याद दिला जाते हैं... -फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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एक दुआ उनके लिए...

एक दुआ उनके लिए... इज्ज़्तो-शौहरत मिले, दौलत मिले जिस तरफ़ जाओ, उधर उल्फ़त मिले -फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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