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नयी कविता/ लोकतंत्र की खुशहाली और शांति के लिए

इधर हमारी सरकार ने लोकतंत्र की खुशहाली और शांति के कुछ फार्मूलेजनहित में कर दिए हैं जारीअनुरोध है देश की जनता से कि वह जनता द्वारा ही चुनी गयीलोकप्रिय सरकार की बात मानकर लोकतंत्र के हाथ मजबूत करे.सबसे पहले तो जनता एक बड़ा काम यह करे किनेता-अफसरों के घरों
 
girish pankaj
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मज़दूर को देखिए : रावेंद्रकुमार रवि

मज़दूर को देखिए -  बीड़ी के धुएँ में साँसों को छौंककर डेढ़ हड्डी पीठ पर एक कुंतल गेहूँ लादे रोटी के दो क़तरों के लिए अपनी साँझ देखती ज़िंदगी को लावा उगलती सड़कों पर मृत कुत्ते की तरह दिन-भर घसीटता
 
रावेंद्रकुमार रवि
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रचने वाले ही बच जाते है मरने के बाद...चिड़िया, तुम कहाँ हो...?

एक दिन जब हम नहीं रहेंगे तब हरे-भरे पेड़ बन कर लोगों को छाँव दे रहे होंगे या फिर फूल बन कर बगरा रहे होंगे खुशबुएँ चारों ओर पेड़ न लगाया होगा तो किसी प्यासे को पिलाया होगा पानीभूखे को कभी दिल से परोसा होगा खानातब हम उसके दिल में रहेंगे
 
girish pankaj
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फिर भी ऐसी क्या बात हो गई ....................

तेरी हँसी जिगर के पार हो गई ,तू रूठी तो आसुंओ की धार हो गई |जानता हूँ में तेरी मज़बूरी को ,फिर भी ऐसी क्या बात हो गई ||हाय तेरा रूठ जाना ,मेरा बार बार मनाना |हम तो दिल के मारे हें ,और तू किस्मत की मारी हे ||शेखर कुमावत
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पापा के लिए

आप ने मुझे चलना सिखाया |पड़ा लिखा कर काबिल बनाया ||आज खड़ा में अपने पांवों पर |और देख रहा सारा जहाँ ||कितना मजबूत हे वो पत्थर दिल |जो आज तक आँधियों से लड़ रहा || आंच तक न आने दी |और सरे दुःख झेल लिए ||शेखर कुमावत
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वसंत फिर आता है : रावेंद्रकुमार रवि

वसंत आता है –जब घर में जन्म लेती है बिटिया! वसंत झिलमिलाता है –जब उसके नयनों में सरसता है अपनापन! वसंत मुस्कराता है –जब मन पर सजते हैं उसकी मुस्कान के सुमन! वसंत खिलखिलाता है – जब सुवासित हवा को गुदगुदाते हैं उसके बोल! वसंत गुनगुनाता है –जब पुलकती है
 
रावेंद्रकुमार रवि
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दूध की गंगा बहायें

मनुश्यमशीने बनाता-बनाताआज खूद मशीन बन गयाजिसेमशीने भी नहीं समझ पा रही है किउसमें कहां-कहां विकृतियांमेरा दावा हैदुनिया की कोई भी मशीनएक दिन सब कुछ कर लेगीमगरअधूरे इंसान का पूरा ईलाजकभी नहीं कर पाएगीक्योंकि इसके तोनस-नस में इतना विष घुल चुका है किआजकल
 
अमृत 'वाणी'
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दूध की गंगा

मनुश्यमशीने बनाता-बनाता आज खूद मशीन बन गयाजिसेमशीने भी नहीं समझ पा रही है किउसमें कहां-कहां विकृतियांमेरा दावा हैदुनिया की कोई भी मशीनएक दिन सब कुछ कर लेगीमगरअधूरे इंसान का पूरा ईलाजकभी नहीं कर पाएगीक्योंकि इसके तोनस-नस में इतना विष घुल चुका है कि आजकल
 
अमृत 'वाणी'
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रोटी का टुकड़ा

सौ मंजिल ऊँची ईमारत केसुनहरी झरोखे सेगोरे हाथों ने फेंकाएक सूखी रोटी का टुकड़ाजो गिरासीधा एक भिखारी के कटोरे मेंऔर झटके से बंद कर दिएसतरंगी चूडियों नेकांच के किंवाड़भिखारी चला गयाकिन्तु मैं अभी तक वहीं खड़ा हूँतभी से सोच रहा हूँरोटी कितनी बड़ीइंसान कितना
 
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कर्जो काळो नाग हे

जाता जाता के गया , बूडा ठाडा लोग |कर्जो काळो नाग हे , लख उपजावे रोग ||लख उपजावे रोग , मूंगी आवे दवाई |आंसू ढळता जाय , लोग हुणे न लुगाई ||के 'वाणी' कविराज , मले मूंडा मचकाता|छिप छिप काढे दांत , भायला जाता जाता ||
 
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सुनो शिल्पकार

अरे शिल्पकारधन्यवाद तुम्हें बारम्बारधन्य तुम्हारी कला ,धन्य तुम्हारे छैनी गज और हथोड़ेजो गिनती में बहुत थोड़े |आश्चर्य तुम पंद्रह दिनों में हीकिसी भी उपेक्षित पत्थर को भगवन बना देते होहम कलम के धनी होकरपन्द्रह वर्षो में भीइन्सान को इन्सान नहीं बना पाते
 
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वह भी हारा

वह भी हारा जो अंतिम स्वांस तक लड़ता - लड़ता दुश्मनों से हारा उससे ज्यादा वह हारा जिसने दुश्मनों के सामने डाल दिए हथियार और उठा लिए अपने हाथ उपर उससे ज्यादा तो वे हारे जिन्होंने हथियार ही नहीं उठाए किन्तु सबसे ज्यादा तो वे हारे जो अपने आपसे हारे हारते
 
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काला धुँआ

मुझे दिख रहा तुम्हारा चेहरा धुन्धलाऔरतुम्हें मेराक्योंकि दोनों के बीच मेंभौतिकता काकाला धुँआ |
 
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तोते

तोतेएक सुबह के भूखे तोतेशाम के सूर्यास्त को देख करमेरी सो साल कीभाविस्य्वानी न करोसामने के चोराहे को देख करबस इतना सा बताओकी घर लोतुन्गाया हास्पिटलया सीधा मगघटवहांएक तोता और हेमेरे मोहल्ले में वहा बता देगामुझे कल का भविष्य |
 
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गुनाह

गुनाहों की दुनिया मेंह्महर गुनाह से बचते रहेइसलिए कि हमारेनन्हें मासूम बच्चे हैंमगरबेगुनाह होना हीइतना बड़ा गुनाह हो गयाकिआज कल गुनहगारों की बस्ती मेंबेगुनाहों के घरसरे आम तबाह हो रहे |
 
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पैसा

पैसा ऐसी धार है , बनती आंसू धार |धार उधारी झेलते , डूब गए मंझधार ||डूब गए मंझधार , सुनाय सब अपने गीत |नई नई है राग , नहीं सुने कोई मीत ||कह 'वाणी' कविराज , हाल बिगड़ा है ऐसा |पैसा मांगे लोग , हम मांगे पैसा - पैसा ||
 
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चवन्नी और अठन्नी

आज कलजहाँ देखो वहाँकई मितव्ययी दांतपराई अठन्नी को भीइतनी जोर से दबाते हैंकिबेचारी अठन्नीदबती - दबती चवन्नी बन जातीजब भीवह खोटी चवन्नी निकलतीइतनी तेज गति से निकलतीकि उन कंजूस सेठों का जबड़ा हीबाहर निकल जाताऔरइस एक ही झटके में शरीर कीनस नस की बरसों
 
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अब हमको देना वोट

महंगाई की मार पड़ी , दिया कमर को तोड़ |हो गए हम विकलांग सभी , खड़े हैं  सब हाथ जोड़ ||खड़े हें सब हाथ जोड़ , कौन  पूंछे हाल हमारे |साथी सब गये छोड़ , दूर बहुत हैं किनारे ||मंत्री जी समझाए , दिया उनको तुमने वोट |नहीं रहे कमर एसी अब  हमको देना
 
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सांप हमें क्या काटेंगे !!

सांप हमें क्या काटेंगेहमारे जहर सेवे बेमौत मरे जायेंगेअगर हमको काटेंगे ?कान खोल कर सुनलोविषैले सांपो वंश समूल नष्ट हो जायेगाजिस दिन हम तुमको काटेंगेक्योंक्योंकिहम आस्तीन के सांप हे |अमृत 'वाणी'
 
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डॉ. सिद्धेश्वर सिंह की नई कविता - दो बातें : अमलतास से

डॉ. सिद्धेश्वर सिंह की कविताएँ Normal 0 false false false MicrosoftInternetExplorer4 /* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes; mso-style-pa
 
रावेंद्रकुमार रवि
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अल्पना वर्मा की नई कविता : अमलतास के झूमर

खिल-खिलकर मुस्कुराते हुए, जब भी देखा तुमको, सोचा - पूछूँ - "रंग चुराया धूप से तुमने या फिर कोई रोग लगा है? झुलसते-जलते मौसम में कैसे तुम लहराते हो?
 
रावेंद्रकुमार रवि
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सूरज : रावेंद्रकुमार रवि की नई कविता

सूरज Normal 0 false false false MicrosoftInternetExplorer4 /* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes; mso-style-parent:""; mso-padding-alt:0
 
रावेंद्रकुमार रवि