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अधर्मी और धर्म-विरोधी मैं

मेरे कस्बे में आए दिनों किसी न किसी साधु-सन्त के प्रवचन आयोजित होते रहते हैं। जब-जब भी ऐसा होता है, मेरी शामत आ जाती है।साधु-सन्त के अथवा/और उनके मत के अनुयायी आग्रह करते हैं कि मैं ऐसे प्रवचनों में नियमित रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कराऊँ। कोई पन्द्रह बरस
 
विष्णु बैरागी
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धर्म और चक्करदार जलेबी

यह निठल्ला चिन्तन है। एकदम रूटीन वाला। फुरसतिया चिन्तन। जब करने को कोई काम न हो तो फिर यही काम हो जाता है।हमारे जीवन में धर्म की भूमिका क्या है? वह हमें रास्ता दिखाता है या रास्ता रोकता है? बिना किसी बात के, गए कुछ दिनों से ये सवाल मेरी आँखों के आगे नाच
 
विष्णु बैरागी
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भक्त भूखे: भगवान को अजीर्ण

धर्म के नाम पर हमारे देश में कुछ भी हो सकता है और कुछ भी किया/कराया जा सकता है। हमारी राष्ट्रीय भावनाएँ अपवादस्वरूप भी आहत हो जाएँ तो बड़ी बात किन्तु धार्मिक भावनाएँ कभी भी, किसी भी बात पर आहत हो जाती हैं। धार्मिक परम्पराओं के साथ छोटी सी छेड़-छाड़ भी ह
 
विष्णु बैरागी
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पहला वास्तविक धार्मिक फतवा

या तो मेरे सिस्टम में कोई गड़बड़ है या फिर मेरे नेट कनेक्शन में कि दो दिन से मैं चिट्ठे नहीं पढ़ पा रहा हूँ। कुछ चिट्ठे मैं ई-मेल से प्राप्त करता हूँ। किन्तु वे भी या तो खुल ही नहीं रहे हैं या फिर बहुत अधिक देर बाद, धीमे-धीमे। इसी कारण मुझे नहीं पता कि
 
विष्णु बैरागी