प्राणी ऐसा जगत में , जन्म न लिया कोय | होवे पूरा सदगुणी , अवगुण एक न होय ||पंकज विपदा में साथ दे , उसको अपना मान | जैसे सुनार घिस कर करे , सोने की पहचान ||
ले हाथों में हाथपका हुआ जब पेड़ से, चुआ रसीला आम। झट से मैंने लिख दिया, उस पर अपना नाम।। ख़ूब पसीना बह रहा, बनकर सबका मित्र। ख़ुशबू इसकी लग रही, जैसे महके इत्र।। पूरी दोपहरी रहे, गरमी से हम पस्त। शाम सुहानी हो गई, हवा चली जब मस्त।। मन करता है छाँव के,
देखो मानुष कर रहा ,है मौतों का व्यापार |पंकज यह क्या हो रहा , हर घर अत्याचार ||दूल्हा देखो बिक रहा ,खड़ा है बीच बाज़ार | लाख -लाख का मोल है ,कैसा यह व्यापार ||
बहुत दिन हुए इस ब्लाग पर कुछ लिख नहीं पाया। आज अचानक से एक पुरानी कहावत मय दोहा याद आ गया तो सोचा कि इस से आप लोगों को भी अवगत कराया जाए। जहाँ देखहूं निज अधिक बिगार, लघु लाभहु कर तजहुँ विचार नहिं यह बुद्धिमान की चाल, "दमडी की बुलबुल टका
कुछ दोहे और हाज़िर करता हूं........... अब किसका विश्वास हो, किसका करें यक़ीन. ना कौड़ी के तीन हैं, ना तेरह में तीन.. लक्कड़बग्घे, तेंदुए, गीदड़, कव्वे, सांप. खड़े इलैक्शन में हुए, तन पर खादी ढांप. समय-समय की बात है, समय-समय का फेर. चश्में चोकन्ने फिर
कुछ दोहों और कईं दिनों की अनुपस्थिति हेतु खेद सहित उपस्थित हूं आज आंगन से कहने लगी, रो-रो कर दहलीज़. दक्षिण दरवाज़े गये, पश्चिम गयी तमीज़. सत्य-सनातन परम्परा, पूजा-पाठ विचार. गये लुटेरे लूट कर, सात समंदर पार. राम-कथा के नाम पर, धंदे का संयोग. कैसेट,