पसंद करें
0
नापसंद करें

शास्त्रीय गाल-वादन की बुनियादी समझ का हंगामा

कन्फ़्यूज़न में रणनीति है या रणनीति में कन्फ़्यूज़न !?--2 जैसा कि वादा था कि दूसरे लेख के साथ इस क़िस्से को ख़त्म करेंगे। अगर ‘हंस’ में अलंकारिक भाषा में कोई प्रतिक्रिया आती भी है तो उसे नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की जाएगी।(जेंडर जिहाद, हंस, जून 2010)शास्त्रीय
 
संजय ग्रोवर Sanjay Grover
पसंद करें
0
नापसंद करें

कन्फ़्यूज़न में रणनीति है या रणनीति में कन्फ़्यूज़न !?

हंस के मई अंक में मेरा एक लेख है। यह अंक नेट पर आज, लगभग एक महीना देर से अवतरित हुआ है। वजह तकनीकी रहीं होंगीं। यह लेख हंस के कालम की कुछ बातों पर प्रतिवाद-स्वरुप है। अभी एक मित्र ने फोन पर कहा कि इसे ब्लाग पर लगाकर किसकी चर्चा चाहते हो-कालम की या अपनी
 
संजय ग्रोवर Sanjay Grover
पसंद करें
0
नापसंद करें

धत्त तसलीमा !

वे इतनी बेवकूफ़ रहीं कि क्रांति और बदलाव की कुसंगत में पड़ गयीं। उस मूर्ख औरत को यह नहीं न मालूम था कि यहां क्रांतिकारियों और परिवर्तनकारियों को भी पहले कलाकार, शिल्पकार और साहित्यकार होना पड़ता है, भले बाद में उस सीखी हुई भाषा से भ्रांति और भटकाव फैलाओ।
 
sanjaygrover
पसंद करें
0
नापसंद करें

धत्त तसलीमा !

तसलीमा जो हैं सो बचपन से ही अत्यंत षड्यंत्रकारी प्रवृत्ति की रहीं। उन्होंने ख़ुद ही अपने चाचा-मामा को उकसाया कि वे उनसे दुराचार करें या इसकी कोशिश करें ताकि बड़ी होकर वे इस पर लिख कर पैसा कमा सकें।वे इतनी बेवकूफ़ रहीं कि क्रांति और बदलाव की कुसंगत में पड़
 
sanjaygrover
पसंद करें
2
नापसंद करें

हैंइ

देवियो और सज्जनो, मैं भगवान बच्चन इस ब्लाॅग पर भी आपका स्वागत करता हूं। आप तो जानते ही हैं मैं अत्यंत सभ्य और भद्र एक्टर हूं। इंसान भी हूं।‘कौन बनेगा ख्रोरपाती’ भी मैं ऐसे पेश करता था जैसे क्लास ले रहा होंऊ । हांलांकि मैं सबको सर-सर कहता था पर प्रतिभागी
 
sanjaygrover
पसंद करें
0
नापसंद करें

व्यंग्य-कक्ष में *****राष्ट्रप्रेम*****

कहते हैं कि प्रेम अंधा होता है, मगर हम आजकल के राष्ट्रप्रेमियों को देखें, तो लगता है कि राष्ट्रप्रेम कहीं ज्यादा अंधा होता है, और कथित राष्ट्रप्रेमियों को प्रेम करने वाले कितने अंधे हो सकते है, इसका अंदाजा तो कोई अंधा भी नहीं लगा सकता। अगर आपने देश की
 
sanjaygrover
पसंद करें
0
नापसंद करें

उदारता क्या है ?

लगभग सभी धर्मों के मानने वाले यह दावा करते हैं कि धर्म इंसान को उदार, सहिष्णु और मानवीय बनाता है। मेरे मन में अकसर कुछ सवाल उठते हैं। चूंकि मैंने इन सवालों को आज तक किसी दूसरी जगह नहीं पढ़ा, इसलिए मन हुआ कि इन्हें आपके सामने रखूं। यह मेरी एकतरफा सोच ह
 
sanjaygrover
पसंद करें
2
नापसंद करें

उदारता क्या है ?

लगभग सभी धर्मों के मानने वाले यह दावा करते हैं कि धर्म इंसान को उदार, सहिष्णु और मानवीय बनाता है। मेरे मन में अकसर कुछ सवाल उठते हैं। चूंकि मैंने इन सवालों को आज तक किसी दूसरी जगह नहीं पढ़ा, इसलिए मन हुआ कि इन्हें आपके सामने रखूं। यह मेरी एकतरफा सोच ह
 
sanjaygrover
पसंद करें
4
नापसंद करें

कुछ खुरदुरी-सी दो ग़ज़लें/लगभग बुरी-सी दो ग़ज़लें

ग़ज़ल जोकि ये समझ रहे हैं मुझे कुछ पता नहीं है उन्हें जाके ये बता दो उन्हें ख़ुद पता नहीं है यूंही ख्वाहमख्वाह ही डरके कोई बात मान लेना इसे तुम हया न समझो, हरगिज़ हया नहीं है दुत्कारना दलित को, चालू को चाट लेना जो इसी को जीत समझे कभी जीत़ता नहीं है वो ज
 
sanjaygrover
पसंद करें
1
नापसंद करें

ऐ आगंतुक ख़लल न डाल

ईमानदारी एक रणनीति है होने से ज़्यादा ज़रूरी है दिखना दोस्ती एक मजबूरी है जीने के लिए कोई न कोई शगल ज़रूरी है स्वाभिमान एक लहंगा है हालांकि पड़ता बड़ा मंहगा है और हालात की हवा भी है बहुत तेज़ विनम्रता एक चालाकी है ज़्यादा कसके पकड़ो तो हाथ से छूट जाती है ब
 
sanjaygrover
पसंद करें
0
नापसंद करें

क्या हमें ‘सच का सामना’ नहीं ‘सच का परदा’ चाहिए !?

नैतिकता पर बहस शायद आज की सबसे मुश्किल बहस है। क्योंकि ज़्यादातर लोग ‘चली आ रही नैतिकता’ पर अड़े रहते हैं, भले व्यवहार में इसका उल्टा करते हों। थोड़े-से लोग नैतिकता के नियमों को बदलने की कोशिश करते हैं। उनमें से कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें पुराने नियम अमानवीय
 
sanjaygrover
पसंद करें
1
नापसंद करें

ग़ज़ल,काफ़िया,माफ़िया.....

ग़ज़ल अपनी तरह का जब भी उन्हें माफ़िया मिला बोले उछलके देखो कैसा काफ़िया मिला फ़िर नस्ल-वर्ण-दल्ले हैं इंसान पे काबिज़ यूँ जंगली शहर में मुझे हाशिया मिला मुझ तक कब उनके शहर में आती थी ढंग से डाक यां ख़बर तक न मिल सकी, वां डाकिया मिला जब मेरे जामे-मय में मि
 
sanjaygrover
पसंद करें
2
नापसंद करें

व्यंग्य-कक्ष में ‘आदरणीय जीजाजी’

सभ्य समाज में आदर झटकने के जो कुछेक तरीके मुझे जंचे हैं उनमें से एक है किसी का दामाद हो जाना। जिस घर के आप दामाद हो गए, अगर थोड़ी देर के लिए उस घर को हम राष्ट्र मान लें तो समझिए कि उस घर में आपकी हैसियत राष्ट्रपति जितनी हो जाती है। भारत के राष्ट्रपति
 
sanjaygrover