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गोविंद मूनिस के श्रद्धांजलि

के ले जाई नदिया के पार...आशुतोष कुमार सिंहकवनो भासा आ बोली के बढ़ावे में ओह भासा में बनल फिलिम के बहुते योगदान होखेला. फिलिम के कथानक ओह भासा आ बोली के संस्कार के परदा प उकेरे के काम करेला. अउर ई सब तबे संभव हो पावेला जब ओह फिलिम के कथा लिखे वाला आदमी ओह
 
bhojpuriyababukahin
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यह उसका जन्म दिन था जो अब नहीं है

12 जून उसका जन्म दिन था जो अब नहीं हैवीरेन्द्र जैनआज 12 जून हैआज उसका जन्म दिन है।है नहीं था, क्योंकि वह अब इस दुनिया में नहीं है। वैसे जो लोग दुनिया में नहीं रहते उनका भी जन्म दिन मनाया जाता है, पर इस मामले में ऐसा नहीं है। यह जन्म दिन उसके जाने के साथ
 
वीरेन्द्र जैन
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दोस्ती क्या है?

दोस्ती क्या है?मेरी नज़र...आज  मेरे नज़र से देखिये दोस्त क्या हैं? दोस्त का मतलब मेरे लिए क्या है? क्या दोस्ती है मेरी जिंदगी में...ये कोई कविता तो नहीं लेकीन मेरे कुछ करीबी मित्रों के नाम हैं...मैंने कोशिश तो बहुत की, की एक अच्छी कविता बने लेकीन शायद
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वो सहता गया....

दर्द उसको भी होता था खून उसका भी रिसता  था तुम जख्म देते गए वो सहता गया तुम दोस्ती के नाम पर मांगते रहे कुर्बानियाँवो तुम्हारे भरोसे पर हर लम्हा साथ देता गया तुमने मिटा दिया उसने आह भी ना निकाली ये दोस्ती का है इम्तिहान हँस के वो कहता गया..
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मोटू और छोटू

मोटू को घर जाना है। तो उसे आई एस बी टी (बस अड्डा) तक छोड़ने जाना होगा।बस में बैठे। चले। आई एस बी टी के पास उतरे।अचानक, हैरान परेशान मोटू (अपनी जेबें टटोलते हुए): मेरा मोबाइल कहाँ है? (मोटू के पास नोकिया 3310 हुआ करता था, उस वक्त का पोपुलर मोबाइल)छोटू:
 
स्पाईसीकार्टून
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सामाजिक फ्राड़ीये

अजब तमाशा गजब हे खेलदोस्ती की रेलमपेल गिफ्ट कर रहे प्रदान कागा गा रहे प्यार की ताननेटवर्किंग का जमाना हेफोटो देखे के फ़साना हे भोले भले फंसे रहे हे ये सामाजिक फ्राड़ीये हंस रहे हैं भावानायोँ की तिजारत जारी हैं जिस्म की भूख सबसे भारी हे
 
makrand
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गुलाब और प्यार

वैलेंटाइन अब केवल प्रेमी-प्रेमिकाओं का ही त्योहार नहीं ......इस दिन हर उस व्यक्ति के प्रति स्नेह जताने का चलन हो गया है.......,जिसे किसी भी रूप में प्यार किया जाता हो...... लोग अपने दोस्तों, शिक्षकों, वरिष्ठों को भी फूल देकर स्नेह और आदर प्रकट करते
 
acharyakeshav
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'वे दिन बहूत अच्छे थे'

'वे दिन बहुत अच्छे थे। काश लौट आते। तब कोई तकलीफ नहीं थी। जिन्दगी में उठा-पटक नहीं थी। वक्त मेहरबानी करे। वे दिन लौटा दे ।' अक्सर, ये शब्द सुनने को मिल ही जाते हैं। कोई पुराना दोस्त जब अचानक फ़ोनकर कहता है, पहचाना?, और आप कह बैठते हैं.'अबे तू। इतने दिनों
 
नीरज तिवारी
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मैं आज से अविनाश दास को अपना दोस्त मानने से इंकार करता हूं

अविनाश दास, मोहल्ला लाइव वाले कभी मेरे दोस्त होते थे। रांची में उनके साथ कई खूबसूरत शामें गुजारीं। दुनिया की बेहतर शक्ल को ईजाद करने के लिए कसरतें कीं और बराबरी की दुनिया के वे हामी भी लगे। इन दिनों जब वे मुझे अपनी इच्छाओं, सपनों और जरूरी कामों से दूर
 
सचिन ..........
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ये वादा भी तोड देते हैं!

वादा भी अजीब चीज है। करते वक्त लगता है सचमुच जीने का मकसद मिल गया। अब इसे निबाहना ही आदमी होने की शर्त है। लेकिन फिर तोड देते हैं। तोडते वक्त सब कुछ पहले की तरह हो जाने का अहसास चेहरे पर नुमायां हो जाता है। दिल इस डर में घुलने लगता है कि कमीनगी थोडी और
 
सचिन ..........
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फिर पूछें कि कौन दुश्मन है ..

शेष नारायण सिंह(rejectmaal.blogspot.com से साभार)अपनी स्थापना के समय से ही भारत और पाकिस्तान के बीच तल्खी कई स्तर पर महसूस की जाती रही है. पाकिस्तानी हुक्मरान शुरू से जानते रहे हैं कि 1947 के पहले के भारत में रहने वाले मुसलमानों को बेवक़ूफ़ बना कर
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सखी

एय सखी याद आती हो तुम आज भी, एय सखी भूली नही तुम्हे मै, आज भी जरा इतना तो कहो ... एय सखी क्या आज भी तुम हो वही? क्या आज भी तुम बदली नही? एय सखी क्या आज भी किसी बात पर तुम हसती हो बेबाक सी ? एय सखी क्या आज भी पसंद है तुम्हे वो फिल्म, वो गीत और वो खटाई
 
मेनका
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हम मस्ती कर रहे हैं तो आपका क्या जा रहा है?

मेट्रो से ऑफिस आ रहा था। कॉलेज स्टूडेंट्स का एक ग्रुप मेरे पास में खड़ा था। उस ग्रुप में दो गुट थे, एक लड़का और एक लड़की, दूसरा लड़का और दूसरी लड़की। मेरा दिमाग उड़ने लगा.... ये साली मेट्रो कुछ साल पहले क्यों नहीं चली? कितना आसान बना दिया है प्यार कर
 
प्रशांत अस्थाना
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आओ, किसी पुराने दोस्त को मेसेज करें

बचपन की दोस्ती भी क्या दोस्ती थी! मॉर्निंग असेंबली में साथ-साथ जाना, साथ बैठना, साथ लंच करना, ब्रेक में पानी भी पीना होता था तो बेस्ट फ्रेंड को साथ ले जाना जरूरी होता था। जिस दिन बेस्ट फ्रेंड स्कूल न आए, उस दिन बाकी सब बेकार। अगले दिन बेसब्री से दोस्
 
सोनिया वर्मा
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30 साल लंबा इंतज़ार... और आंसुओं की बाढ़

जिंदगी में बहुत-सी चीज़ों को नहीं समझ पाया। प्यार भी इन्हीं में से एक है। प्यार में हमें बेइंतहा तकलीफ होती है, दुनिया-जहान की परेशानियां सामने आती हैं, इस ख्याल के अलावा हर चीज़ बेजान-बेकार-सी लगने लगती है। इस पर भी अंजाम मन-मुताबिक सुकून देने वाला
 
आलोक सिंह भदौरिया
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30 साल लंबा इंतज़ार... और आंसुओं की बाढ़

जिंदगी में बहुत-सी चीज़ों को नहीं समझ पाया। प्यार भी इन्हीं में से एक है। प्यार में हमें बेइंतहा तकलीफ होती है, दुनिया-जहान की परेशानियां सामने आती हैं, इस ख्याल के अलावा हर चीज़ बेजान-बेकार-सी लगने लगती है। इस पर भी अंजाम मन-मुताबिक सुकून देने वाला
 
आलोक सिंह भदौरिया
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क्योंकि वक्त अभी बदला नहीं है

हम कहानी क्यों पढते हैं ? यथार्थ को परखने के लिए ? अपनी नजर साफ करने के लिए ? खाली वक्त काटने के लिए या फिर परिचित कथाकार की मुग्ध शैली से रूबरू होने के लिए ? सवाल और भी हो सकते हैं , जवाब अलग अलग होंगे। मैं अश्विनी पंकज की कहानी इनमें से किसी भी वजह
 
सचिन ..........
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दोस्ती

आज मैंने अपने भगवान जी पर एक एहसान किया मन में फुदक आयी एक अनरगल इच्छा को भगवान जी से बिना कहे मन ही में खुरच खुरच कर , खिरच खिरच कर खत्म कर दिया ! शाम को रोज की बात चीत में यह सब उनसे कह खुश हुआ । रोज की तरह वे भी कुछ बोले नहीं बस थोड़ा सा मुस्कुराये
 
Aarjav
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दोस्ती.................

नमस्कार मित्रों आज मैं अपने ब्लाग "शायराना" की शुरुआत कर रहा हूँ । आशा है आप लोगों का भरपूर समर्थन और प्यार मिलेगा । एक छोटी सी गज़ल प्रस्तुत करता हूँ । जैसी भी लगे यह रचना बताइयेगा । ज़िन्दगी की धूप में दोस्ती की छाँव दे दो, मन के मेरे आंगन में अपने प
 
नवनीत नवल
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डरता हूँ 'अक्लमंदों' से (रुबाइयाँ)

काश , ऐसा न कुछ करे कोई, रात भर सिसकियाँ भरे कोई,बेवफाई न इस कदर कीजे,प्यार के नाम से डरे कोई। लोग कितने अजीब होते हैं,गर्ज़ हो तो करीब होते हैं,फेर लेते नज़र खुदा बन कर,क्योंकि दिल के ग़रीब होते हैं।खौफ़ कैसा खुदा के बन्दों से,खंजरों से लगे न फन्दों से,
 
Hemant Snehi
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दोस्ती एक प्यारा रिश्ता .....

एक दिन मेरे खुदा ने मुझसे पूछा ,क्या हैं ये दोस्ती ,क्यो बनाता हैं तू दोस्त ,ऐसा क्या हैं इस रिश्ते मैं ,जो नही हैं लहू के रिश्ते में ।मैंने खुदा से कहा ,एक भरोसा हैं दोस्ती ,एक विश्वास हैं दोस्ती ,जो मुश्किलों में दे साथ ,वो परछाई हैं दोस्ती ।इन चीजों
 
chirag
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यह भी तो "प्यार" ही है न..!!!

बात उस समय की है जब मैं अपने ग्रेजुएशन के चौथे सेमेस्टर की परीक्षाएं दे रहा था. उस वक़्त मेरी तबियत काफी बिगड़ी हुई थी, इसलिए मेरी देखभाल के लिए मेरी माँ भी मेरे साथ ही थीं. उस दिन मेरा तीसरा या चौथा पेपर था. हम लोग एग्जाम हाल से पेपर देकर निकले. बारि
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ऐ काश कि अब होश में हम आने ना पायें

ये बचपन के दोस्त भी क्या ख़ास फुर्सत से बने होते हैं...एक तरफ जहाँ लगता हैं कि वो इतने अच्छे हैं कि खुदा ने उन्हें बड़े दिल से बनाया होगा और उस पर वो हमारा प्यारा बचपन...मासूमियत से भरा...ना कोई बंदिश और ना कोई चिंता...बस ऐश ही ऐश...खुशनसीबी भी क्या
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दृश्य का चित्र बनाकर चुपचाप क्यों निकल जाती है कविता

तकरीबन पांच साल पहले की एक गर्म दोपहर में ठंडी चाय के साथ रांची में रामजी भाई ने कहा था- "इधर की कविता अपने समय का भरपूर दृश्य तो बनाती है, लेकिन उसमें मुठभेड के तरीके सिरे से गायब हैं." अनिल अंशुमन और सत्यप्रकाश चौधरी के साथ उस बैठकी में कविता पर लं
 
सचिन ..........