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किस युग में रह रहे हैं हम

समाज में ऐसे विचारों के लिए जगह क्यों है ? अंजलि सिन्हाखाप पंचायतें लोगों के निजी जीवन को निर्देशित करने के लिए पंचायत और महापंचायत करती हैं और सार्वजनिक रूप से कत्ल का फरमान सुनाती हैं। सोचने का मुद्दा यह है कि ऐसा कर पाने में वे सफल क्यों हो रही
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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खयालों की खुशबू को आजादी का इन्तजार

-विनीत तिवारीसन्‌ 1925 में हुए काकोरी बम काण्ड के बाद क्रान्तिकारियों का दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ बिखरा हुआ था। भगतसिंह ने उस संगठन के बिखरे टुकडों को इकट्ठा कर संगठन का नया नाम रखा - हिन्दुस्तानी समाजवादी प्रजातांत्रिक संघ। एक शब्द का यह जोड
 
सचिन ..........
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या तो गवाही दो या गूंगे हो जाओ!

अंडमान की ८५ वर्षीय महिला "बोआ बुजुर्ग" जो "बो" भाषा को समझने काअंतिम माध्यम थीं। इस लेख को संक्षिप्त में २ भागो में रखता हूँ, पहली तो "बो" और दूसरा भारत में " हिंदी के समकालीन सरलीकृत साहित्य के प्रति"।" बोआ " इस नाम से इन दिनों सभी परिचित होंगे, "बोआ"
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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भविष्य अमेरिका का है यह झूठा दावा है

एरिक हाब्सवाम का एक साक्षात्कार पिछले पांच दशकों से लंदन से निकल रही मार्क्सवादी विमर्श की बहुचर्चित पत्रिका ‘न्यू लेफ्ट रिव्यू’ के जनवरी–फरवरी 2010 के ताजा अंक में प्रकाशित हुआ है। 1991 में हाब्सवाम की प्रसिद्ध पुस्तक‘आत्यांतिकताओं का युग’ (एज आफ
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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गुड खाएं और सैम संग गुलगुले भी

( सैमसंग पुरस्कार मुद्दे पर यह आलेख भाई कुमार मुकुल के ब्लाग कारवां से साभार)नामवर सिंह का कथन है-‘नेहरू की दृष्टि में संस्कृति एक ‘एलीटिस्ट’ अवधारणा थी और उन्होंने रवींद्रनाथ की परंपरा में ही भद्रवर्गोचित अकादमियों की स्थापना की।’ अब भद्र वर्ग अंकल सैम
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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साम्राज्यवाद के लिए आसान शिकार नहीं है ईरान -अंतिम किश्त

पेट्रोल राजनीति की अमेरिकी साजिशों को दो दशक पहले सद्दाम हुसैन ने चुनौती दी थी। आज न सद्दाम हैं न उनकी राजनीति को आगे बढाने वाला कोई कद्दावर ईराकी। हां, ईराक के पडोसी मुल्क ईरान और अमेरिकी नाक के नीचे हुंकार भरते वेनेजुएला इस प्रतिरोध को थामे हुए हैं।
 
सचिन ..........
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साम्राज्यवाद के लिए आसान शिकार नहीं है ईरान-3

अमेरिकी इजारेदारी की बुनियाद पर नजर रखने वाले जानते ही हैं कि यह चेहरे अपना दामन पाक साफ कभी नहीं रख पाते। उनके बोले-कहे के बीच पेंचोखम को छोड भी दें, तो किये में दोगलेपन की कई मिसालें सामने आती रही हैं। यह जानी पहचानी रणनीति जो करती हुई दिखती है असल में
 
सचिन ..........
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साम्राज्यवाद के लिए आसान शिकार नहीं है ईरान-2

इस लेख के पहले हिस्से में हमने देखा कि किस तरह अमेरिका परस्त राजनीति सच्चाई पर नकाब चढाकर अपने ढोल को मजबूत करती है। कैसे शैतान की धुरी को खत्म करने की कवायद की गई जो हर मुमकिन प्रतिरोध के बावजूद अमेरिकी अकड को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकी। आर्थिक मंदी के
 
सचिन ..........
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किसका विकास- कैसा विकास?

(जाने-माने अर्थशास्त्री गिरीश मिश्र जी का यह आलेख अभी हाशिया पर पढ़ा … मुझे बेहद उपयोगी लगा तो यहां भी लगा दिया )पिछले कई हफ्तो से यह धुआंधार प्रचार चल रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था विश्वव्यापी अति मंदी के भंवर से लगभग बाहर आ गई है। उसकी संवृध्दि रफ्तार
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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दुश्मन का घेराव : यानी अमेरिकी सेना की चहलकदमी दक्षिण एशिया में

ईरान। इराक, सउदी अरब, कुवैत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से घिरा देश। दूसरे शब्दों में अमेरिकी फौजों की बंदूक का अगला निशाना। तेल की राजनीति को जब आतंकवाद, इस्लामिक कट्टरता और परमाणु संधि के लच्छों में उलझाने की तरकीबें तेज की गई थीं तब विनीत तिवारी ने एक
 
सचिन ..........
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रूढ़िग्रस्त लेखक के लालित्यपूर्ण लेखन पर एक नजर

एक पत्रकार के बारे में अपनी राय कायम करने का एक आसान तरीका तो यह है कि उसके लेखन को तत्कालीन परिस्थितियों, राजनीति और माहौल के सापेक्ष रखा जाए। तात्कालिक मसलों पर जनपक्षीय राजनीतिक समझ के साथ लिखा गया पत्रकार के लिए एक बेहतर कसौटी हो सकता है। अफसोस प
 
सचिन ..........