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कुछ ऐसे यादगार सफर थे वो..वो सफर अब वापस नहीं आयेंगे..

जब मैं स्कूल में था, तो ज्यादातर पटना में ही रहता था.कहीं जाना भी हुआ तो अपने गांव बेगुसराय, वो भी छठ पूजा में.हम तो जैसे साल भर सिर्फ छठ पूजा का ही इंतज़ार करते थे.अभी भी याद है वो दिन.जिस दिन हमें गांव जाना होता था, उस दिन सुबह 4 बजे मम्मी उठा देती
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कुल - देव

कुल - देव लगा चित्र दीवार पे , जो होवे कुल - देव। खेल करे बालक कहीं , सूरदास के देव।। सूरदास के देव , या कौशल्या के राम। मोती चुगते हंस , लेय शारदा का नाम।। कह ` वाणी ´ कविराज , होगा भव सागर पार। वैतरनी तर जाय , ऐसी रंगो दीवार ।। शब्दार्थ : कुल - देव
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