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पुराने गाने का नया पाठ

मतलब वही, नये बोतल में पुरानी शराब, यही होगा न? कि सरल और निर्दोष से दीखते इस वाक्‍य में कहीं इससे भी ज्‍यादा गूढ़ार्थ घुसे हुए हैं? ठीक है, आपकी बला से घुसे रहें, यह कोई डिकंस्‍ट्रक्शनिस्‍ट सेशन नहीं है, और न आपमें से कोई उम्‍बेर्तो एको का चेला है,
 
Pramod Singh
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एक अनुपयोगितावादी नेक़ सलाह..

जाने क्‍या थे कहां थे मगर समझते थे खुद को जनता का आदमी ठेपी सज्‍जन, सो वही ऊंचा खटराग चिल्‍लाये, दिल में छेद हो जाये का छेदकराग साधे फैलाये, ‘ओ लिखवैये, अबे क्‍यों? सतरह से होते सत्‍तर सात सौ पन्‍ने रंगोगे मगर फिर उसके बाद हज़ार, सात हज़ार क्‍या,
 
Pramod Singh
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आधुनिक-बहक-बोध

कुछ अच्‍छे घरों के बिगड़े बच्‍चे थे, कुछ तंगहाली की गालियों पे चलके, दहल के, तो कुछ चोटगड़ी मोहब्‍बत की फटी छातियां छिपाकर आये थे, मतलब ज़माने के सताये थे. और हरमख़ोर ज़माना हमेशा खराब होता है, टॉम और जेरी के किस्‍से फकत टीवी पर हंसाते हैं, बाहर जो टहलता
 
Pramod Singh
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संगीन, रंगीन

कहानी के कितने गहीन रंग. सोचता है आदमी, अचकचाए, असमंजस के तार पर सवार देखने निकलता है बनी-बुनी जाती होगी कहानियों की शराब, खिली खिली बहार. इतनी आसानी से कुछ हाथ आता है? पौने चार मिनट का वीडियो दाँत निकाले आदमी की खिल्ली उड़ाता है.
 
Pramod Singh
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काली - सफ़ेद

क्युँ होती है इतनी बेचैनी? अचानक हहसकर मन चाहता है किसी की गर्दन रेत दें या गाल काट लें. फिर शायद यह भी उस बेचैनी का ही प्रताप होगा कि मन ऐसा कुछ भी करने की जगह साहित्य की सोचने लगता है, क्यों सोचने लगता है? महीनों महीनों की लंबी नींद के बाद आँख जब कैमरे
 
Pramod Singh
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उदासी..

गुमसुम, ग़ायब रहती है , महीनों ख़बर नहीं होती कहां भागी, क्‍या हुआ, सारे सम्‍बन्‍ध खत्‍म कर लिए? के ख़्यालों में दबे, पुराने दु:खों की तरह लगभग भूल-भुला जाती है और जीवन अनजानी हवाओं व सड़कों पर पहचानी आदतों के बासी रुमाल में लिपटा किसी उडूपी रेस्‍तरा
 
Pramod Singh