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चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लियेयहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती हैचलो यहाँ से चले और उम्र भर के लियेन हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगेये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लियेख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब
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सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा...

कल हमने अपना ६१वाँ गणतंत्र दिवस मनाया... स्कूल-कॉलेज, सरकारी दफ्तरों और कुछ प्राइवेट कार्यालयों में भी तिरंगा फ़हराया गया... नेताओं ने बड़े बड़े भाषण दिये... अमन, शांति और सौहार्द बनाए रखने की नसीहत दी गयी... बीते सालों की कुछ उपलब्धियों को गिनाया गया...
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दुष्यंत कुमार पर डाक टिकट कुमार जारी होगा

हो गई पीर परबत- सी पिघलनी चाहिएइस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिएआज ये दीवार परदों की तरह हिलने लगीशर्त लेकिन थी की बुनियाद हिलनी चाहिएहर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव मेंहाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिएसिर्फ हंगामा खडा करना मेरा मकसद नहींमेरी
 
DONGRE तृष्णा