1
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये
कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लियेयहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती हैचलो यहाँ से चले और उम्र भर के लियेन हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगेये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लियेख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब
Jun 10 2010 08:25 PM



Shuffle








