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फिर कई मासूम बचपन, पल में जवां हो जायेंगे

लो यहाँ इक बार फिर, बादल कोई बरसा नहीं,तपती जमीं का दिल यहाँ, इसबार भी हरषा नहीं .उड़ते हुए बादल के टुकड़े, से मैंने पूछा यही,क्या हुआ क्यों फिर से तू, इस हाल पे पिघला नहीं.तेरी वजह से फिर कई, फांसी गले लगायेंगे, अनाथ बच्चे भूख से, फिर पेट को दबायेंगे.माँ
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है अब लगाता उन्हें काफिओं की तरह.

क्या खूब पायी थी उसने अदा। ख्वाब तोड़े कई आंधिओं की तरह॥ कतरे गए कई परिंदों के पर। सबको खेला था वो बाजियों की तरह॥ हौसला नाम से रब के देता रहा। औ फैसला कर गया काजिओं की तरह॥ ख़ास बनने के ख्वाब खूब बेंचे मगर। करके छोडा हमें हाशिओं की तरह॥ साहिलों को मिलाने
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सैलाबे-जुनूँ-ए-इश्क, तुम ही सह नहीं पाए.....

कभी मैं चल नहीं पाया, कभी वो रुक नहीं पाए।मेरे जो हमसफ़र थे, साथ वो रह नहीं पाए।।मेरे घर में नहीं आई, कितने सालों से दीवाली।तू आ जाये तो आँगन में, अँधेरा रह नहीं पाए।।लगाते हैं सभी तोहमत, मैं तुझसे हार जाता हूँ।मेरी हस्ती ही ऐसी है, कि कोई टिक नहीं
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पूछता रहता है क्या

ये परिंदा इन दरख्तों से, पूछता रहता है क्या,ये आसमां की सरहदों में, ढूंढता रहता है क्या.जो कभी खोया नहीं, उसको तलाश करना क्या,इन दरों को पत्थरों को, चूमता रहता है क्या.खोलकर तू देख आँखें, ले रंग ख़ुशी के तू खिला,गम को मुक़द्दर जान के, यूँ ऊंघता रहता है