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आखिर मिलने की चाह हमें खींच कर ले ही गई ---

कहते हैं , चाहने वाले उड़कर, दौड़कर , चलकर , तैरकर पहुँच ही जाते हैं। ऐसा हमने स्कूल की बायोलोजी की किताब में पढ़ा था , पोलिनेशन एंड फ़र्तिलाइज़ेशन के चैप्टर में।हालाँकि हालात तो ऐसे न थे , फिर भी हम भी पहुँच ही गए --दिल्ली के ब्लोगर मिलन में ।और चुरा लिए
 
डॉ टी एस दराल