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हमने तो भगवान को बेदिल ही देखा है

इंसानों की बस्ती में भी तंहा हैं हम वो इसलिए की सबसे जुदा हैं हम हमें सताते हैं सबके गम हो जाती हैं हमारी आंखे नम दुनिया में इतना दर्द देखा है अपना दर्द बहुत कम लगता है कहते हैं मर्द को दर्द नहीं होता है लेकिन हमने ऐसा मर्द नहीं देखा है जिसके दिल में
 
राजकुमार ग्वालानी
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रहे मुहब्बत

राहे मुहब्बत दर्द से भरर्पूर है, अब बे-वफ़ाई इश्क़ का दस्तूर है।दिल के समन्दर मे वफ़ा की कश्ती है, आंखों के साग़र को हवस मन्ज़ूर है।ग़म के चमन की रोज़ सजदे करता हूं, पतझ्ड़ के व्होठों मे मेरा ही नूर है।बारिश का मौसम रुख पे आया इस तरह, ज़ुल्फ़ों का तेरा साया भी
 
ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι
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दर्द-ए-दिल दिल तक ही रखूँ, यह ज़रूरी तो नहीं

दर्द-ए-दिल दिल तक ही रखूँ, यह ज़रूरी तो नहीं,सरेआम रों दूँ, पर ऐसी भी मेरी मजबूरी  तो नहीं ज़माने का दस्तूर निभाना, है हिदायत वाइज़  की फिर मिलेगी जन्नत पर यह उम्मीद पूरी तो नहींडरता हूँ बेअदबी की तोहमत न दे
 
Sudhir (सुधीर)
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देह की दुकानें

--------------------------दर्द उधार नहीं लेतीं देह की दुकानें हैं उसूल पर चलती हैं.अनुसूया की मर्यादा द्रोपदी की दृढ़ता और सीता का सतीत्व पुते हैं सब लिपस्टिक की परतों में .चमकदार झलर-मलर कपड़ों के भीतरकाजल से काले हैंआगत  के
 
prkant
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मैं आम आदमी हूँ आओ मुझे मारो

मैं आम आदमी हूँ , मैं किसी पार्टी का दिया हुआ नाम नहीं हूँ , मैं तब  से हूँ जब से दुनिया बनी , मैं गवाह हूँ दुनिया के बनने , उसके आगे बढ़ने और उसके अभी तक के सफ़र का ,और मैं गवाह रहूँगा तब भी जब ये दुनिया ख़तम हो रही होगी , मैं तब भी था जब रामायण
 
timeforchange
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बीता हुआ कल...

बीता हुआ कल, मिल जाये कहीं, किसी मोड़ पर बढ़ जाना तुम हँसकर, सिसकता उसे छोड़करन सुनना उसकी कोई दिलकश कहानीन बहाना आँखों से दो बूँद पानी ...कसकर थामना तुम
 
Sudhir (सुधीर)
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विश्वास

जब-जब तुमने कहा"तुम मेरी हो"मुझे लगामैं चीज़ हूँ कोईजब-जब तुमने कहा"मैं तुम्हारा हूँ"मैंने महसूस कियाएहसान कर रहे हो तुमऔर जब तुमने कहा"हम बने हैं एक-दूजे के लिये"मुझे ये प्यार नहींव्यापार लगाइतने बरस बाद भीमुझे तुम्हारे प्यार परविश्वास क्यों नहीं?
 
mukti
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पूर्ण समर्पण

प्रिय, तुमने कहा था मुझसेकि तुम मुझकोपाना चाहते होपूरी तरह सेतब मैंतुम्हारे "पूरी तरह से" कामतलब नहीं समझ पायी थीअब जान गयी हूँमैं तैयार हूँकर दूँगी मैंपूर्ण समर्पणदे दूँगी तुमको ये तनइसमें क्या रखा हैकर सकती हूँतुम पर अर्पणसौ-सौ जीवनक्योंकि मैंनेतुमको
 
mukti
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वह दर्द तुम्हारा है

तुम्हारे सिवा भी दर्द बहुत थेकुछ मिट गए,कुछ बीत गएकुछ रीत गएबाकी सब रह रहकर चुभते है पर एक वो जो न बीता न रीता और न ही भूलाऔर चुभाना तो दूर जिस कमबखत ने छुआ तक नहीं मुझेबस एक आदत सा साथ साथ चलता हैराग राग में बसा रहता है पर आज भी कुआर हैवह दर्द तुहारा है
 
pankaj mishra
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तेरा ना होना

आज इक बार फिर तेरा ना होना नागवार गुजरा है. वीरानी शाम में आशिक हवाओं ने मुझे बदनाम समझा है. पुराने जख्म अब पककर,मलहम से हाथ चाहेंगे. सनम आ जाए महफ़िल में ,दुआं दिन रात मांगेंगे. अभी इक दर्द का लश्कर सीने के पर उतरा है….   कहूँ साजिश सितार
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सुभाष डे

मेरा दोस्त , दोस्त कम भाई था , मेरे दुःख में -बगल खडा मिलता , कल सुबह , उसकी मौत हो गई , उसकी पत्नी ,मेरी सहपाठी थी , हम तीनों ने साथ -साथ फ़िल्म का कोर्स , पूना से किया था ,सन ७३ में , रानी फूट -फूट के रोई , मेरे कंधे लग के , उसकी बेटी से परचित हुआ
 
भंगार
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तुझसे मिलकर जाना, दर्द का रिश्ता है साँझा होता

मैंने तो सुना था कि दर्द है बड़ा खुदगर्ज होता,हर कोई सिर्फ़ अपनी ही किसी बात पर है रोता।तुझसे मिलकर जाना, दर्द का रिश्ता है साँझा होता,वरना मेरे हालत पर, ऐ दोस्त! तेरा चेहरा न भीगा होता ।तेरी झील सी गहरी आँखों में बसा समुंदर न होता,यूँ बिना किसी आवाज़,
 
Sudhir (सुधीर)
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अधूरापन

कभी भावनाओं को शब्द नहीं मिलते हैं कभी शब्दों में भाव नहीं आ पाता है, कभी खुशी में दिल उदास होता है कभी-कभी ग़म में भी आराम आ जाता है क्या हुआ? हर बात अधूरी-सी क्यों लगती है ज़िन्दगी इतनी उजड़ी उजड़ी-सी क्यों लगती है?
 
mukti
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तेरा प्यार

तेरा प्यार बहुत कुछ थामेरे लियेपर सब कुछ नहीं,और भी बहुत कुछ हैदर्द है, तन्हाई है,सूनापन हैऔर अन्धेरा भी,बेशक चले जाओ तुमपर तुम्हारी याद हैइतना सब कुछ हैदुनिया मेंमेरे लिये
 
mukti
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टूटे सपने

टूटे सपनों की किरचेंबिखरी हैंमन की फ़र्श परबटोरो तो चुभती हैंहाथों मेंना देखोतो पैरों मेंदेखो तोआँखों मेंइस कश्मकश केपार उतार देकोई मेरे टूटे सपनों कीकिरचें बुहार दे
 
mukti
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एक निर्वस्त्र दर्द

एक जागती रात के सिरहाने बैठकर,आकाश की काली आँखों में झांककर,मैंने अपना एक निर्वस्त्र दर्द उठायाझूठे सपनो के तार-तार से कपड़े पहनायेजो बचा, उसे दुनियादारी के -फटेहाल पैबन्दों से छिपायान चेहरा देखा, न रूह नापीसिर्फ़ एक एहसास पर किएक दिन मेरे दायरों से निकल
 
Sudhir (सुधीर)
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जन्म

वो प्रेमी था , प्रेम नही मिला तो , मौत को गले लगाया , एक दुःख छोड़ गया ,अपनों के दामन में , वो माँ जिसने नवमाह का दुःख भोग था , एक सुख पाने को उंगली पकड़ के चलना सिखाया था , दिया था पहला शब्द माँ का , वही माँ बैठी रो रही थी ख़ुद भी भूत की योनी में जा
 
भंगार
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सजा

रात के दो बजे थे , आंखों में नींद नहीं थी , इंतजार था -जवान बेटे का , घर आया नही था अभी तक , .........दरवाजे पे दस्तक हुई , समझ गया ............, बचपन से ही ,दरवाजे की कुंडी ऐसे ही खटकाता था , दरवाजा खोला -, सामने खड़ा था ,सर झुकाए ,माफ़ी मांगने के अन
 
भंगार
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पाप

रोज एक पाप करता हूँ , उन्हें देख कर ,सुबह की अजान देता हूँ , वर्षों से यही कर रहा हूँ , अब बूढा हो गया हूँ आँखों , से दिखता नही ,बेटे मेरी आदत को जानते हैं , आपरेशन नही करा रहें हैं , ........उनको इस बात का पता चल गया , दुसरे दिन मेरे नाम का एक ड्राफ
 
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इश्क

इश्क का नजारा वो देखा , मैंने दांतों तले उंगली दबानी पडती है , वरना जीभ कट जाने का डर रहता , वो लडकी अपने प्रेमी के साथ , मन्दिर में अपने ,माता पिता के सामने खडी थी , वो हिंदू थी ,लड़का मुस्लिम था , इश्क में जात -पांत दिखता नही , माँ -बाप ने कहा ,अगर
 
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बूढा भिखारी

अक्सर वो बूढा अँधा भिखारी , मुझे चौक पे मिलता है , आदतन मैं उसे एक रूपया देता हूँ , और ढेर सारा अशिर्बाद पाता हूँ , अंधे की जवान लडकी से , मेरी अच्छी पहचान हो गई , मुझे दूर से आता देख कर , अपने बाबा के कानो में कुछ कहती है , तब बाबा का चेहरा खिल जाता
 
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गोरा रंग

मुझे गोरा रंग बहुत पसंद है , पर गोरा रंग बनता कैसे ...? मालूम नही मुझे ........ लोग कहते हैं ,काले रंग को , सिल -बट्टे पे , सुबह से शाम तक खूब पीसो , सुबह तक वो काला रंग ,गोरा हो जाता है , जब भी मैं उनका इस्केच बनाता हूँ , रात भर मेरी नौकरानी बसंती ,
 
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फरेबी मन

दिल मेरा बड़ा चालू है , बड़ा चटक -मटक करता है , कभी इस ओर गिरता है , कभी उस ओर भागता है , बहुत समझाता हूँ , पर जिद्द किए था ,उनकी झलक पाने को , रास्ते में वो जब नजर आयी , मुझे छोड़ दिल इस तरह भागा, जैसे किसी ने उसके गाल पे चिकोटी काट ली हो , पास तो उन
 
भंगार
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शीर्षकहीन

आज मुझे अपना ब्लॉग लिखते हुए लगभग चार महीने हो गए हैं और पहली बार मैं कविता नहीं लिख रही हूँ । मुझ पर किसी ने किसी अन्य की कविता से 'ऊर्जा 'उधार लेने का इल्जाम लगाया है । बस ,इसे सीधे-सीधे चोरी न कहकर एक सभ्य सा शब्द रख दिया । मैं किसी विवाद में नहीं
 
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वीभत्स

एक लड़की ही जान सकती है /कैसा होता है /अनजानी नज़रों को झेलना /जैसे हजारों सूइयां /चुभ उठी हों शरीर में ,/कैसा होता है /अनचाहा स्पर्श /रेंग रहे हों जैसे/लाखों बिच्छू /भूरे ,काले ,ज़हरीले /घिन से भर उठता है मन /जब कभी भीड़ में /अनजाने पुरूष की उँगलियाँ
 
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