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काकः काकः, पिकः पिकः

ये आवाज़ अक्सर परीक्षा के समय कूजती थी। जब सारी दुनिया से ध्यान हटा कर एक लक्ष्य परीक्षा होती दिन रात के परिश्रम में जब इसकी आवाज़ कान में पड़ती तो मन कुछ हलका सा प्रतीत होता था। अब भी जब ये आवाज़ सुनती हूँ तो हाथ में पु्स्तक लिए बाउंड्री के भीतर पड़ी
 
कंचन सिंह चौहान
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पांच त्रियाचरित्र पीड़ितों की आपबीती और बेटों का ब्लौग!

असफलता से सीखते नहीं, कभी न कभी हम सब, अपनी असफलताओं का ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ देते हैं। पार्श्व मे काला परदा लगाकर ख़ुद को गोरा दिखाने की चाहत सब मे होती है। दूसरे को दोषी ठहराना कोलिन स्प्रे की तरह है जिससे हम अपना आईना साफ करने का प्रयास निरंतर क
 
वनमानुष