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बाग़ी दिल..

तन्हा चन्दा हुआ, चाँदनी खो गयीअब ये दुनिया चले, चले न चले बुझ गया जो दीया, शम्मा भी सो गयी अब कोई लौ जले, जले न जले खामोश सागर है क्यों, क्यों लहरें हुई गुम अब जो अम्बर गले, गले न गले बाग़ी सा दिल हुआ, धड़कने थम गयी कोई गुलशन खिले, खिले न खिले जीने का कुछ
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तन्हाई कहती है .....

देवेश प्रतापतन्हाई अपनी व्यथा सुनाते हुए कहती है ......अक्सर वो मुझसे ख़फा रहते है । जाने क्यों मुझसे जुदा रहते है ॥ मैं दामन विछा देती हूँउनकी ख़ुशी के लिएजब उनके जीवन केफूल मुरझा जाते है ॥ मचल जाती हूँउनकी एक हंसी के लिएसहन होता नहीं ,ये देख करजब वो
 
देवेश प्रताप
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ऐसा क्यों है..

क्यों बरसों तेरा इंतज़ार किया मैँने क्यों बेरहम होके अपने गम को सिया मैंने क्यों सिसकियों को अपनी खामोश किया मैंने क्यों तेरे गम को हर साँस जिया मैंने जब तू नहीं तो साथ मेरे तेरा सामां क्यों है तेरे इंतज़ार को तो तेरे साथ ही रुखसत कर दिया था मैंने फि
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दिया वक्त ने धोखा वरना..

जो बिना मिले ही खो गया उसे क्या ढूंढे कोई गली गली दिल ये कह के बहलाया न मिलना भला न जुदाई भली दर पे उस सितमगर के बिन खिले मुरझाई हरेक कली गुलशन को कोई समझा दो न पतझड़ भला न बहार भली यादों के संदर में मैं डूब के अब उस पार चली मौसम से ज़रा कह दो न सेहर
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नई दोस्त

क्या मेरी 'नयी दोस्त' से मिलोगे? एक ऐसी दोस्त; जो मेरे, चोबिसों घंटे साथ रहती है... हर पल, हर जगह, मेरे साथ चलती है.. जहाँ कहीं भी मैं 'चलता' हूँ, जहाँ कहीं भी मैं 'रुकता' हूँ- एक छोटे से 'लम्हे' के लिए भी- मुझसे 'जुदा' नहीं होती.. 'जीवन संगिनी' की त
 
मानव मेहता
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छाई तन्हाई है

आज फिर छाई तन्हाई है,आज फिर याद आपकी आई है,आज फिर हम उदास है,आज फिर बुझे बुझे से प्यास है,आज फिर आपकी बातें याद आती है,आज फिर तन्हाई तडपाती है,आज फिर आपको याद किया है,आज फिर रब से फरियाद किया है,आज फिर आप ख्वाबों में आये है,आज फिर आपने अरमां जगाये है
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मैं खुद से बातें करता हूँ

कितने दिन के बाद मिला हूँमैं खुद से बातें करता हूँतेरा हाल मुझे मालुम हैतू बतला, अब मैँ कैसा हूँमैं तन्हा घर से निकला थारात ढले तन्हा लौटा हूँटूट गया आईना दिल काअब घर में तन्हा रहता हूँफटी जेब है होश हमारासिक्का हूँ खुद खो जाता हूँकब्र बदन की और
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बहते पानी पे तेरा नाम लिखा करते हैं

बहते पानी पे तेरा नाम लिखा करते हैंलब-ए-खा़मोश का अंजाम लिखा करते हैंकितना चुपचाप गुजरता है मौसम का सफ़रतन्हा दिन और उदास शाम लिखा करते हैंकाश, इक बार तो वो ख़त की इबारत पढ़तेअपनी आँखों मे सुबह-ओ-शाम लिखा करते हैंलब-ए-बेताब की यह तिश्नगी मुक़द्दर हैअश्क बस
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न चाह कर भी मुस्कुरातें हैं..

चेहरे की उदासी को अश्कों से छुपाते हैंना चाह कर भी तेरे गम में मुस्कुरातें हैंइस दर्द को पी जाना आसान नहीं हैख़ुद डूब के औरों को तैरना सिखाते हैंकिसने कहा था इश्क में जुनू की हद से गुज़र जाओजो अब ये हिज़र मिला है उसे चुपचाप ही पी जाओवादे ने तुम्हारे हैं