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"‘नन्हा-तारा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

 मैं अपनी मम्मी-पापा के,नयनों का हूँ नन्हा-तारा। मुझको लाकर देते हैं वो,रंग-बिरंगा सा गुब्बारा।।मुझे कार में बैठाकर,वो रोज घुमाने जाते हैं।पापा जी मेरी खातिर,कुछ नये खिलौने लाते हैं।।मैं जब चलता ठुमक-ठुमक,वो फूले नही समाते हैं।जग के स्वप्न
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक