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जाने कहां गए वो दिन टाइप की चंद पुरानी यादें..

हाय रे ज़माना, कैसा बदला तेरा फ़साना. क्‍या थे क्‍या हो गए टाइप. हालांकि तब, पहले भी, यह नहीं ही रहा होगा कि आदर्शलोक के हम आदर्शलोग थे, फिर भी. मतलब इस एकता का प्रतीक वीडियो में ही ज़रा बाबू-बबुनी की आवाज़ की मिठाई और उसकी मासूमियत पर ग़ौर फ़रमाइए, यह
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गोले, सामानों के शोले.. द स्‍टोरी ऑव स्टफ़

चीज़ों की ठीक-ठीक पहचान न होने से फिर चिरकुटइयां होती है. कल मुझसे हुई. लगा जैसे ड्रॉपबाक्‍स बता रहा है अपने पीसी का माल मैं उनके फॉल्‍डर में कॉपी करके चिपका दूं और फिर जिनसे कहूं वे ऑनलाइन उसे ड्रॉपबाक्‍स के फोल्‍डर में खोलकर पा लेंगे, डाउनलोड की ज़
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तीन फ़ि‍ल्‍में..

डॉक्‍यूमेंट्री थी, फ़ि‍ल्‍म देखे कुछ दिन हो गए लेकिन अवचेतन में अभी भी जैसे कहीं अटकी हुई है. कुछ ख़ास फ़ि‍ल्‍मों के साथ क्‍या होता है ऐसा कि एक अच्‍छी बितायी शाम की तरह स्‍मृति और संवेदना में कहीं कुछ छूटा रह जाता है? पियेर बोर्दू , पहले कभी नाम सुन
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कैपिटलिज़्म एंड अदर किड्स स्‍टफ

दस-दस मिनट के पांच टुकड़े हैं, इस दुनिया का हिसाब-किताब कैसे चलता है जानने में आपकी बालसुलभ जिज्ञासा हो तो देख डालिये. मैंने नेट से डाऊनलोड करके पूरी डॉक्‍यूमेंट्री एक साथ देखी, बालसुलभ प्रसन्‍नता हुई. हमारे, अनिल व अभय जैसे पहुंचे हुए बुद्धिज्ञानी क