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एहसास खोए जब

लिखने बैठे हैं कुछ आजबहुत दिनों बादसोचते थेरब्त-ए-ख्यालों के जहाँ सेआवाज़ देंगे एहसासों कोकोई गीत, ग़ज़ल, कविता, नज़्म या रुबाईदौड़ी चली आयगी...हमारे दामन में आ बेनक़ाब हो जाएगी।लेकिन ये क्या ?दिल-ए-गोशा में कोई जज़्बात ही नही ,एक सुनहरी तीरगी और बाआवाज़
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दफ्तर की ज़िन्दगी

दफ़्तर की जिंदगी कितनी निरस और उबाऊ होती है, इसका अहसास होने लगा है । दफ्तर में व्यक्ति का व्यक्तित्व खोने लगता है । उसकी आत्मा मरने लगती है । वह व्यक्ति नहीं बल्कि वस्तु अधिक होता है ; जिसका अधिकारी मनचाहा प्रयोग करते हैं । उसकी निजी स्वतंत्रता दफ़्तरी