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वाङ्मय

बाल ठाकरे को अनायास मिली चुनौतीयह संभवत: इस समय विचार का विषय नहीं है कि शाहरुख खान की फिल्म माई नेम इज खान किस प्रकार की फिल्म है? कला की दृष्टि से वह ठीक ठाक है या नहीं? उसकी विषयवस्तु क्या है या उसका मैसेज कैसा है? फिल्म में विषय या कहानी के साथ
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जीवेतः शरद शतम्

मोबाइल फोन लोगों की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुका है. लेकिन मैं इससे उतना अंतरंग नहीं हो पाया हूं. पता नहीं क्यों, मुझे यह हर बार अपनी एकाग्रता में खलल महसूस होता है. कभी-कभी तो इतना बेसुरा लगता है कि दिमाग भन्ना उठता है. हालांकि आज के संदर्भ में जब
 
adhyatan
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हा॓ट सिटी में….

जिस व्यक्ति ने गाजियाबाद को सबसे पहले हा॓ट सिटी का नाम दिया, वह जरूर दूरंदेश और मीडिया-जगत का चतुर खिलाड़ी रहा होगा. स्पर्धा के इस युग में किसी नाम को चलाने के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता. कौन-कौन से पापड़ नहीं बेलने पड़ते. मगर उस भले आदमी की काबलियत
 
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धर्म बनाम दर्शन

भारतीय परंपरा में नास्तिक का अभिप्राय वेद को प्रामाण्य मानने से है. तदनुसार वेदों को आप्तवचन—ऊपर से उतरा हुआ, अपौरुषेय माना जाता है. परंतु व्यवहार में आस्तिक या नास्तिक का अर्थ क्रमशः ईश्वर को मानना या न मानना रह गया है. भारतीय दर्शन परंपरा में ऐसे भी
 
adhyatan
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डायरी के कुछ अटपटे पन्ने !

यह डायरी हिमाचल प्रदेश से श्री गुरमीत बेदी के सम्पादन में छपने वाली पत्रिका “पर्वत राग” के जुलाई-सितम्बर 2008 अंक में छपी है. 14 जुलाई 2005 दिल्ली से लौटा। इस बार का अंकुर मिश्र पुरस्कार फैजाबाद के विशाल को मिला। बहुत अच्छा कवि है और कर्रा
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डर

ले एक दिन और बीत गया. वक्त को तो चलना है, चलेगा ही. आदमी गिनता रहे जिंदगी के पल-छिन. करता रहे हिसाब-किताब. बिठाता रहे जिंदगी का गणित. रोजी-रोटी की कीला-कांटी में गुजार दे जिंदगी. वक्त को तो आगे बढ़ना ही है. तो उसकी चिंता क्या की जाए. वैसे आज का दिन कुछ
 
adhyatan
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सिनेमा का गाना गाने से भी साँप का ज़हर उतर जाता है ?

 एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी -आठवाँ दिन -एक               आज हम लोगों ने खुदाई शुरु ही कि थी जाने कहाँ से एक सांप घूमता हुआ आ गया । और हमारी ट्रेच में घुस गया .. मजदूर लोग डर कर दूर खड़े
 
शरद कोकास
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मतलब बैल और आदमी की कीमत एक बराबर ?

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-सातवाँ दिन –तीन “हुआ यह कि बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में पुरातत्ववेत्ताओं को काले पत्थर का ढाई मीटर ऊँचा एक स्तम्भ मिला जिस पर हम्मूराबी की यह कानून संहिता खुदी हुई थी । “ मैने बताया । “ अच्छा क्या लिखा था उस पर “ अजय ने पूछा
 
शरद कोकास
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मिस्त्र की हसीना का कोई किस्सा सुनाओ यार

  एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-सातवाँ दिन –दो             आज रात बिस्तर में घुसते ही रवीन्द्र ने सवाल किया “ यार तैने बहुत दिनो से कोई किस्सा कहानी नहीं सुनाया है क्या बात है ? “ मैने कहा “ नहीं
 
शरद कोकास
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ज़मीन के नीचे एक शहर मिल रहा है

विगत दिनो मेरे अनेक नये मित्रों ने मेरे इस ब्लॉग “ पुरातत्ववेत्ता ”पर दस्तक दी है । आप सभी को मैं अत्यंत विनम्रता पूर्वक यह जानकारी देना चाहता हूं कि मैने इस ब्लॉग की रचना वैज्ञानिक दृष्टि के विकास और इतिहास बोध निर्माण के लिये की है । इसमें मै सबसे पहले
 
शरद कोकास
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तो मचिस कौन अगिया बेताल ले गया ?

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-छ्ठवाँ दिन –तीन आज शाम सिटी अर्थात दंगवाड़ा जाना तय था । किशोर आज मुखर था और बार बार राममिलन को छेड़े जा रहा था । नदी के पास बरगद का एक बड़ा पेड़ देखकर किशोर ने कहा “ जानते हो पंडत , इस बरगद पर एक भूत रहता है । “ राममिलन ने
 
शरद कोकास
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डायरी…

काल “सहजच ब्लॉग” वरील “आज मै खुशं हूं” पोस्ट वाचता वाचता अचानक लक्षात आलं की आपण बरेच दिवसांत डायरी लिहिली नाहिए… लहानपणापासून मला वाटायचं की डायरी लिहिणारी पब्लिक खूप मोठ्ठी होत असते. म्हणजे जे सगळे पुढारी, क्रांतीकारी,
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इतिहास लिखा जाने के बाद ज़मीन से निकले अवशेषों का क्या होता है

एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-छ्ठवाँ दिन –दो हम लोग आज का कार्य समाप्त करने ही जा रहे थे कि डॉ.वाकणकर का आगमन हुआ । “कैसा लग रहा है दुष्टों?” उन्होने हमारे मुरझाये चेहरों की ओर देखकर पूछा । हमने उन्हे अपनी उपलब्धियों और असफलताओं से अवगत कराया । सर बोले “ तो
 
शरद कोकास
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एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-छठवाँ दिन-एक

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शरद कोकास
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एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पाँचवा दिन –तीन

और हम हिन्दू विधर्मियों की हत्याएँ करने लगे खाना खाकर हम लोग बरगद के पेड़ों की बस्ती की ओर टहलने निकल गये । टीले पर तो आज पूरा दिन बीता था इसलिये उस ओर जाने का मन नही हुआ । बरगदों का घना साया और आसमान में बादलों के पीछे से झाँकती चान्द की शर्मीली रोशनी ।
 
शरद कोकास
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एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-पाँचवा दिन –दो

चिकन खाने से पहले बताना होगा मुर्गी पहले आई या अंडा ? Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI /* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes;
 
शरद कोकास
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एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी-चौथा दिन-चार

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शरद कोकास
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आज की डायरी

नैनीताल जाने की ठान रखी थी कल रात ही से। प्रकाश भाई चेयरमैन का चुनाव लड़ रहा है उत्तराखण्ड क्रांति दल से। उसी का ऑर्डर था कि मैं नैनीताल पहुंच जाऊं. सुबह - सुबह नैनीताल ही से भाभी का फ़ोन आया हुआ था कि
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