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ट्रैन भी रुकती थी

फिर प्रस्तुत हूं एक और संस्मरण ले कर , लेकिन ये मेरी नही मेरे पिताजी की यादें है | अक्सर पिताजी अपने बचपन की बातें बताया करते है जो उनके अच्छे - बूरे दिनो का वर्णन होता है | यादे अनेक है पर आज मैं उनके एक अनोखे संस्मरण को प्रस्तुत कर रहा हूं | अपनी किशोर
 
ऋषिकेश खोङके "रुह"