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टिपण्णी करना और टिपण्णी पाने की चाह रखना क्या सचमुच इतना बुरा है .....!!

किसी भी पोस्ट को पढने के बाद मन में जो भी विचार उठते हैं , उनका सम्प्रेषण ही टिपण्णी है ....कलम के धनी साहित्यकारों और इस आभासी दुनिया से दूर काफी नाम कमा चुके लेखकों और लेखिकाओं को टिपण्णी मिलने या नहीं मिलने से कोई फर्क नहीं पड़ता ...मगर जिन्होंने
 
वाणी गीत
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टिप्पणी जो प्रकाशित न हो पा रही थी

सबद मे प्रकाशित इस आलेख पर यह टिप्पणी पोस्ट करना चाह्ता था  पर तकनीकी खामियो के चलते बार बार यही संदेश मिलता रहा - We're sorry, but we were unable to complete your request. When reporting this error to Blogger Support or on the Blogger Help Grou
 
vijay gaur/विजय गौड़
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एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों,ये दिल तुम्हारे प्यार का………………………

ब्लाग पर जारी कट-कट से दूर होकर मैने जब ये बताया कि मैं ब्लाग पर एक अख़बार नेशनल लुक मे कालम लिखना शुरू करने जा रहा हूं,तो जैसे मुझ पर प्यार की बरसात हो गई।मुझे सपने मे भी अंदाज़ नही था कि इतना प्यार मिलेगा मुझे।किसी एक का नाम पहले लूंगा तो दूसरे का प्
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लता मंगेशकर बनाम राखी सावंत

किसीने भी अगर मेरे शो पर अंगुली उठाई तो मैं अंगुली तोड़कर हाथ में दे दूंगी ... बाप रे ... कल जब राखी सावंत किसी समाचार चैनल पर गरज गरज का बरस रही थी ... हमारी सांसें ऊपर नीचे होती रही ... अभी परसों ही तो सिद्धार्थ जोशी के ब्लॉग दिमाग की हलचल पर उनकी
 
वाणी गीत
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लता मंगेशकर बनाम राखी सावंत

किसीने भी अगर मेरे शो पर अंगुली उठाई तो मैं अंगुली तोड़कर हाथ में दे दूंगी ... बाप रे ... कल जब राखी सावंत किसी समाचार चैनल पर गरज गरज का बरस रही थी ...हमारी सांसें ऊपर नीचे होती रही ...अभी परसों ही तो सिद्धार्थ जोशी के ब्लॉग दिमाग की हलचल पर उनकी प्
 
वाणी गीत
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शार्ट लिस्टिंग की युक्ति का एक नाम आलोचना हो गया है

स्मृति यों की सघनता में दबे छुपे समय को पकड़ ने की कोश िश संवेदनाओं के जिस धरातल पर पहुंचाती है, वहां एक ऎसे दिन की याद है जो  सूरज की कोख से जन्म लेती धूप और चन्दा की कोख में पनप ती चांदनी के खूबसूरत बिम्ब की संरचना करती है। बिना किसी दावे के ,
 
vijay gaur/विजय गौड़
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सभ्य लोग कोई नाम याद नहीं रखते

हालांकि सभ्य लोग, भले लोगए अच्छे लोगों की परिभाषा गढ़ती हिन्दी की कई कविताएं गिनाई जा सकती हैं लेकिन अरविन्द शर्मा की कविता में व्यंग्य का अनूठापन उसे अन्यों से भिन्न कर देता है। सभ्य लोगों की तस्वीर अरविन्द के भीतर उस कैमरे की आंख से जन्म लेती है जिस
 
vijay gaur/विजय गौड़
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रचना और संरचना का फर्क

बात आगे बढ़ गई। थोड़ी भटक भी गई। साहित्य में आलोचना इतनी वेग क्यों है ? क्यों एक ही तरह की रचना पर पुरस्कार और उसी तरह की दूसरी रचना को तिरस्कार ? यह महत्वपूर्ण सवाल पिछली पोस्ट में उठा। क्या रचना की कोई निधारित कसौटी हो सकती है ? भाई नवीन नैथानी ने तो
 
vijay gaur/विजय गौड़
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ऐसा तो कभी नहीं हुआ था

नागर्जुन की कविता हरिजन गाथा पर एक टिप्पणी ) साहित्य में दलित धारा की वर्तमान चेतना ने दलितोद्वार की दया, करूणा वाली अवधारणा को ही चुनौति नहीं दी बल्कि जातीय आधार पर अपनी पहचान को आरोपित ढंग से चातुवर्ण वाली व्यवस्था में शामिल मानने को संदेह की दृष्ट
 
vijay gaur/विजय गौड़
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सारी टिप्पणियों का जवाब...

बहुत कोशिश करने के बाद भी मै सबके टिप्पणियों का जवाब नही लिख पाता तो सोचा कि इसके लिए एक पोस्ट ही लिख दिया जाए ( पोस्ट की संख्या भी एक बढ़ जायेगी !)। वास्तव मे अक्सर मै पुरे सप्ताह का पोस्ट एक दिन ही बैठ कर लिख देता हूँ । बीच मे कभी समय मिले तो थोड़ा ब
 
अभिषेक आनंद
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जिस पर न कोई गीत लिखा गया, न कोई अफसाना घड़ा गया

मई २००९ के आउटलुक में प्रकाशित कथाकार जितेन ठाकुर की महत्वपूर्ण कहानी कोट लाहौर वाला कथाकार नवीन नैथानी और कवि राजेश सकलानी की टिप्पणियों के साथ प्रस्तुत है। नवीन नैथानी एक कहानी को कैसा होना चाहिये ? इस सवाल के बहुत सारे जवाब हैं . पाठकों की रुचि ,
 
vijay gaur/विजय गौड़