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क्या दार्शनिक होना बुरा है ?

क्या दार्शनिक होना बुरा है ? क्या ज्ञान के प्रति प्रेम होना स्वाभाविक नहीं है ? क्या ज्ञान के प्रति पागलपन की हद तक जुनून होना समाज के लिए घातक है ? क्या ज्ञान के प्रति जिज्ञासु होना बुरा है ? मैं जानता हूँ कि आप इस बहस में नहीं पड़ना चाहेंगे । फिर भी मैं
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प्रतिबिम्ब

अकेलेपन के साए सच लगते हैं इस अंधेर कमरे में कुछ ढूँढता एक कदम लम्बे रास्ते चले थे एक, निकले कई थामे वक़्त का हाथ दूर निकल आये अरसा लगता है पल-पल पिछड़े मोड़ पर थमे थे न मूड़ सके हम, रुके कई यह कैसी है जंजीरें पैरों में लिए फिरते है सीने से लगाये [...]
 
mequitnever
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डा श्याम गुप्त की कविता ---भरम

भरमजहां पर शब्द रुक जाए , अशब्द स्वर भाष होता है।मूक जब वाच्य होजाए,जन्म अभिनय का होता है।नहीं होती जहां भाषा, मुखर तब मौन होजाता,जहां आलेख चुक जाए, वहां संकेत होता है ॥प्रेम में भाव धारण हो, भक्ति आकार लेती है।भक्ति से, प्रेम तप से , साधना साकार होती
 
Dr. shyam gupta
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दोहराव असहज है पर सहज है

‘नास्तिकता सहज है’ लिखते समय थोड़ा-सा अंदाज़ा था कि इसे पढ़कर कुछ मित्र असहज हो सकते हैं। शायद अब तक किसी ने ऐसा कहा नहीं। बहरहाल, मैंने नास्तिक के प्रचलित अर्थों को लिया। एक आदमी जिसका भगवान से कोई लेना-देना नहीं, जो अपने दैनिक कार्यों के लिए अपनी शक्ति,
 
संजय ग्रोवर Sanjay Grover
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Praan प्राण প্রান

Performed by Matt Harding. Music by Gary Schyman. Sung by Palbasha Siddique. Penned by Rabindrnath Tagore. Published in his Nobel award winning book of Bengali poetry, Gitanjali, in 1910. It took 100 years to understand this poetry and make others
 
mequitnever
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सरस्वती-पूजा

आज सरस्वती पूजा थी....स्कूल के दिनों में हम सुबह जल्दी स्कूल जाकर पूजा की तैयारियां किया करते थे....सरस्वती वंदना,पूजा,प्रसाद वितरण और फिर छुट्टी हो जाया करती थी.....जब से स्कूल जाना बंद किया,घर पर ही पूजा कर लिया करती...हर साल की तरह इस साल भी सरस्वती
 
Neha
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चाणक्य नीति-स्वयं अपने गुणों का बखान करना अल्पज्ञानी का काम (apni tarif svyan na karen-hindi sandesh)

पर-प्रौक्तगुणो वस्तु निर्गुणोऽपि गुणी भवेत्।इन्द्रोऽपि लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गृणैः।।हिन्दी में भावार्थ-जिसके गुणों की प्रशंसा अन्य लोग भी करें उसका ज्ञान भले ही अल्प हो पर फिर भी उसे गुणवान माना जायेगा। इसके विपरीत जिसे ज्ञान में पूर्णता प्राप्त
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श्रीमद्भागवत गीता-ज्ञानी के लिये मिट्टी, पत्थर और सोना एक समान (shri madbhagvat geeta in hindi)

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रिय।युक्त इत्युच्यते योगी समोलोष्टाश्मकांचनः।।हिंदी में भावार्थ-भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि जो ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकार रहित है, जिसकी इंद्रियां भलीभांति जीती हुई है और जिसके लिये
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विदुर नीति-शक्तिहीन होने पर क्रोध न करें (shakti aur krodh-hindi dharam sandesh)

द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा।गृहस्थश्चय निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः।।हिन्दी में भावार्थ-नीति विशारद विदुर जी के अनुसार अकर्मयण्य गृहस्थ और तथा सांसरिक बातों में लगा भिक्षुक सन्यासी अपने लिये निश्चित कर्म के विपरीत आचरण करने के कारण शोभा नहीं
 
दीपक भारतदीप
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संत कबीर के दोहे-स्वाद के कुंऐं में विष पड़ा मिलता है (swad aur vish-hindu dharma sandesh)

माखी गुड़ में गड़ि रही, पंख रही लपटाय।तारी पीटै सिर धुनै, लालच बुरी बलाय।भावार्थ-संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मक्खी जब गुड़ की लालच में अपने पंख फंसा देती है तब अपने हाथ पांव पटकने और सिर धुनने के बावजूद भी उसकी मुक्ति नहीं होती। लालच वाकई बुरी बला
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मनु स्मृति-अपने हृदय को देवता समझें (dil hi bhagvan hai-hindu dharma sandesh)

द्यौर्भूमिरापो हृदयं चंद्रर्काग्नि यमानिलाः।रात्रिः सन्ध्ये च धर्मख्च वृत्तजाः सर्वदेहिनाम्।।हिन्दी में भावार्थ-मनु महाराज के अनुसार आकाश, पृथ्वी, पानी, हृदय, चंद्र, सूर्य, अग्नि, यम, वायु, रात संध्या और धर्म सभी प्राणियों के सत् असत् कर्मों को देखते
 
दीपक भारतदीप
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विदुर नीति-एक भी इंद्रिय में दोष होने पर बुद्धि कुंठित हो जाती है (indriya aur buddhi-vidur niti)

पंचेन्द्रियश्च मत्र्यश्च छिद्र चेदेकामिनिद्रयम्।लतोऽस्य स्त्रवति प्रज्ञा दृतैः पात्रादिवोदकम्।।हिन्दी में भावार्थ-पांच ज्ञानेन्द्रियों वाले मनुष्य में यदि एक इंद्रिय में भी छिद्र या दोष उत्पन्न हो जाये तो उसकी बुद्धि इस प्रकार बाहर निकल जाती है, जैसे मशक
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कटाक्ष Sarcasm

आधुनिक युग का भारतीय एक झुण्ड के आचरण या व्यवहार को सभ्यता कहते हैं | सभ्यता के शुरुआत में स्त्री-पुरुष की भूमिका (लिंग भूमिका) को परिभाषित किया गया था और स्त्री-पुरुष के कार्यों को प्रस्तावित कर, एक झुण्ड को समाज की संज्ञा दी गयी थी| जब यह
 
mequitnever
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Asangoham

असंगोहम् असंगोहम् का क्या अर्थ है? यह संसार में तुम किसी न किसी चीज़ से जुडे हो. जब तुम किसी चीज़ के संग हो जाते हो तब तुम कहते हो कि में बूढा हूँ, जवान हूँ, माँ हूँ, बाप हूँ, लम्बा हूँ, पतला हूँ, अमीर हूँ, गरीब हूँ… यह हमारा स्वभाव है, किसी न किसी च
 
दीपम चटर्जी
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Hamara Asli Swaroop

हमारा असली स्वरूप Q: हमारा असली स्वरूप क्या है? A: वह तो हमें ही ढूंढ़ना है. 'मैं कौन हूँ?', इस चिन्तन में रहकर ढूंढ़ना है. मेरी सजगता किस चीज़ पर है? क्या मैं केवल शारीर हूँ? यह शरीर बार बार मरता है, बार बार जन्म लेता है. पर क्या यही हमारा जन्म- मृत
 
दीपम चटर्जी
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Gyaan pipaasaa

ज्ञान पिपासा गहरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए तैयारी चाहिए. कच्चे घड़े में पानी डालोगे तो वह गल जाएगा, उसको आग में तपाना पड़ता है. घड़ा मज़बूत होने पर ही वह पानी पकडता है. वैसे ही ज्ञान को अपने अन्दर समेटने के लिए साधना करनी पडेगी, तपस्या करनी पडेगी. ज्ञ
 
दीपम चटर्जी
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Praana, Tej aur Oj

प्राण, तेज और ओज हमारे शरीर की एक प्रकृती है और उस प्रकृति से जब हम हट जाते हैं उसे विकृति कहते हैं. शरीर और मन की स्वाभाविक और संतुलित स्थिति को प्रकृति कह सकते हैं. हमारी प्रकृति बदलती नही है. पर उस प्रकृती में विकृतियाँ आती हैं. जैसे गलत भोजन करने
 
दीपम चटर्जी
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अंधविश्वास व विज्ञान क्या हैं ......

आजकल कुछ स्वयंभू ब्लॉग, सम्पादक व विद्वान् - अंधविश्वास को हटाने व वैज्ञानिक सोच का प्रसार करने का तमगा लगाए हुए हैं व छोटी-छोटी बातों को लिख कर विज्ञान-विज्ञान चिल्ला रहे हैं | वस्तुतः अंधविश्वास है क्या --- ---अंधविश्वास कोई वस्तुनिष्ठ या तथ्य निष्
 
Dr. shyam gupta
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ज्ञान और अज्ञान का कानवरसेसन

इस लेख में नए ज़माने की नई भाषा का बहुत प्रयोग हुआ है। समझने की कोशिश करें। अज्ञान: हाँ मैं पुरूष नहीं हूँ ज्ञान: महा पुरूष हो अज्ञान : हाँ येही तो बनना होता है जीवन मे। बन गया में। मोक्ष ज्ञान : नही गुरु के बिना मोक्ष नही होता। अज्ञान : यह तो तुम्हार
 
स्पाईसीकार्टून
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संत कबीर वाणी-परमात्मा के नाम के मतवालों में मद नहीं होता (bhakti aur ahankar-sant kabirdas ke dohe)

राता माता नाम का, मद का माता नांहि। मद का माता जो फिरै, सौ मतवाला काहि। संत कबीरदास का कहना है कि जो भक्त परमात्मा का नाम लेता है वह कभी मद में नहीं आता। वह तो भगवान की भक्ति में मतवाला रहकर हर चीज से अंजान हो जाता है। जो मद में चूर है वह भला कहां मत
 
दीपक भारतदीप
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The world of my thoughts,(shyam smriti, i.e.modern MANU SMRITI.)

धर्म , अर्थ , काम , मोक्ष की अवधारणा ---यूँही थोथा ज्ञान या दर्शन नहीं हैं ,ये पूर्ण वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिक तथ्य हैं । ये मनुष्य के मानस पर गहन वैज्ञानिक प्रभाव छोड़ते हैं ,उन्हें नियमित,संयमित करते हैं। जीवन,राष्ट्र,समाज व व्यक्ति को संयमित व सुचारू
 
Dr. shyam gupta
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अंतरिम

क्या है, क्यों है, कैसे है सोचता था जब पाया तो बहुत खुश हुआ उसके बाद क्या ? पाया, वो मिल गया अब कहाँ, किधर, किसको ढूँढना, चाहत, प्यास, होड़, जिद्द -लक्ष्य के अनेक रूप है पर मैंने एक नया रूप पाया -अलक्ष्य से लक्ष्य का लक्ष्य शून्य ! अंतरिम, मध्यांतर,
 
mequitnever
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विश्व विकास यात्रा

गेपमाईंडर फाउंडेशन विश्व भर के देशों के सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरण संबधी विकास और पतन के आंकडो को बहुत ही रोचक तरीके से बांट कर विभिन्न प्रकार के अनुसंधानों और शोधों में मदद कर रहा है। गेपमाईंडर का ये प्रेजेन्टशन मुझे बहुत भाया - (साभार गेपमाईंडर)
 
नितिन व्यास
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