संतोष चौबे की एक कविता…आना जब मेरे अच्छे दिन हों…
2003 की गर्मियों में एक रविवार को जनसत्ता का रविवारीय अंक पढ़ते हुए मेरी नज़र संतोष चौबे की इस कविता पर पड़ी थी, और तब से मानों यह कविता मेरे दिमाग मे घूमते ही रहती है ना जानें क्यों...। जब-जब इसे पढ़ता हूं तब-तब मानों यह एक नया अर्थ दे जाती है। इस
May 31 2010 01:11 PM



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