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चुगलखोरी के फायदे

झूठ और सच के साथ चुगलखोरी का अनूठा रिश्ता है। एक चुगलखोर को अमूमन झूठा साबित करने की कोशिशें लगातार की जाती हैं मगर असलियत यही है की चुगलखोर से ज़्यादा सच कोई बोलता भी नही। एक चुगली लगाने में कितनी मशक्क़त करनी पड़ती है, इस बात को इस जालिम ज़माने में
 
जैगम मुर्तजा
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चिट्ठाजगत को बचाइए प्लीज़ !!!

क्या हम लोग आज़ादी के मायने जानते हैं? ये एक ऐसा सवाल है जिस से हम आजादी के बासठ से ज़्यादा साल गुज़र जाने के बाद भी जूझ रहे हैं। जवाब भी सीधा सा है। हम आज़ादी के साथ जीना सीख गए गए हैं और इस हद तक आजाद हैं के अब दूसरों की आज़ादी में खलल पैदा करने लगे ह
 
जैगम मुर्तजा
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गंगा की गोद में .

आज पित्र विसर्जन अमावस्या थी सो मैंने सोचा क्यों ना मै भी गंगा स्नान कर ही आऊं। सौभाग्य से गंगा मेरे घर से महज़ छै: किलोमीटर की दूरी पर है बहती है। हालाँकि 'बहती' शब्द का इस्तेमाल पर कुछ लोग अतिशयोक्ति कहकर आपत्ति लगा सकते हैं फ़िर भी गंगा तो बहती ही है।
 
जैगम मुर्तजा
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आरुशी का कातिल कौन?

आरुशी तलवार हत्याकांड में एक बार फिर सी०बी० आई० के हाथ जांच में निराशा ही लगती दिख रही है। जिस मोबाइल फ़ोन के दम पर खबरिया चैनल जाँच एजेंसियों के हाथ कातिल तक पहुँचने का दावा कर रहे थे वो किसी काम का भी नही निकला। एक तो सोलह महीने बाद किसी फ़ोन से डाटा
 
जैगम मुर्तजा
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बादल हुए बेईमान सजनी...

बरसात के मायने ही बदल गए लगते हैं। अब ना वो पहले जैसी झमाझम बारिश होती है और ना ही पहले जैसे कजरारे बादल आसमान पर नज़र आते हैं। याद आते हैं वो दिन जब पानी में कागज़ की कश्तियाँ मन की हिलोरों सी डोलती हुई दूर निकल जाती थीं। जगह जगह भरे हुए पानी में घर
 
जैगम मुर्तजा
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बारिश पर सट्टा लगाओगे क्या?

चार दिन की लगातार बारिश ने लोगों को परेशान कर दिया। और लोगों को भी क्या, सच कहिये तो खुदा की ख़ुद की परेशानी बढ़ा दी। हर तरफ़ से एक ही आवाज़, 'भगवान् बस भी करो'। अल्लाह भी परेशान, ये आदमी है या कुछ और? अरे कोई जुबां भी है इसकी? अभी कल तक तो इन सबकी साझा
 
जैगम मुर्तजा
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दिल्ली में दिल नही लगता...

उस रोज़ जाने मेरा वक्त ही ख़राब आया था या फिर नियति को यही मंज़ूर था, कि मैं दिल्ली चला गया। दिल्ली यूँ तो मुझ से कभी दूर नही रही मगर ना जाने क्यों दिल्ली जाकर हमेशा ही मेरा दिल उचाट हो जाता है। इस में दिल्ली का कोई दोष नही। दोष तो मेरी आदतों का है जो
 
जैगम मुर्तजा
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जब गीदड़ कि मौत आती है...

कहते हैं की जब गीदड़ की मौत आती है तो वो शहर की तरफ़ भागता है।मगर आजकल ऐसा नही होता। शहर जंगल की तरफ़ भाग रहे हैं और रफ्तार भरे हाईवे गीदड़ की मौत का कारण बन रहे हैं। जी हाँ अब गीदड़ मरने के लिए शहर नही आता बल्कि सिर्फ़ हाईवे पार करने की कोशिश करता
 
जैगम मुर्तजा
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पानीपत का तीसरा , चौथा और पांचवा युद्घ : अर्थार्थ भाजपा की कहानी

भाजपा में घमासान मची है। हारी हुई सेना के सेनापति एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं। दल साफ़ तौर पर दोगुटों में बटा नज़र आ रहा है। एक दल जड़ो की और वापसी का नारा दे रहा है तो दूसरे को विचारधारा में ही खोटनज़र आ रहा है। कुछ सेनानी मात्र संगठन राष्ट्रीय
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लालू जी को गुस्सा क्यों आता है ?

लालू जी नाराज़ हैं पर अपनी नाराजगी छिपा नही पाते। दिल में एक टीस सी है। लाख दबाना चाहते हैं मगर दर्द है की जुबां पर आ ही जाता है। अब जुम्मा जुम्मा चार दिन ही की तो बात है। ठाट से सत्ता के गलियारों में दनदनाते फिरते थे। उनकी रेल थी की बगैर सिग्नल दस ज