पसंद करें
3
नापसंद करें

मैजेस्टिक ह्यूमन कॉमदी की कहानी

मैं जुसेप्‍पे को घेरना चाहता था, या मालूम नहीं खुद को सिर के बल खड़ा करके एक ऐसी चीज़ समझने की कोशिश कर रहा था जिस कहन के समझने के दिन अब बीती-बिसरायी हुई, क्‍योंकि सचमुच अब कौन पढ़ता है उपन्‍यास? किताब की दुकानों में और कुछ खुशहाल घरों की अलमारियों में
 
Pramod Singh
पसंद करें
2
नापसंद करें

धुलियाये लैंडस्‍केप में..

जाने कैसी आवारा गोधुलि बेला है, खुले उजाड़ मैदान के एक छोर टहलते हुए लगता है मानो ग़लत पते पर आ गए हों. जैसे मैदानी नाटकीय फैलाव के किसी कोने रेज़्ड प्‍लेटफ़ॉर्म पर कोई तेलुगू बाई का राजस्‍थानी नाच हो सकता था, या प्रतापगढ़ की किसी बिसराई नौटंकी का रिपीट
 
Pramod Singh
पसंद करें
1
नापसंद करें

औरतों के देश में..

जिधर नज़र घुमाओ, वही नज़र आतीं, गजब नज़ारा था. अखाड़े की लड़ाई के वक़्त जैसे पेड़ों के डाल और छतों के मुहाने तमाशाई बच्‍चों से पट जायें, शादी के घर जैसे नहान-घर अटा-बझा रहे और चाय के कप पर कप खाली होते रहें, मगर गिलास भर पानी पाना एकदम मुहाल हो और
 
Pramod Singh
पसंद करें
3
नापसंद करें

एक सरल सिंप्लिसिटी के उलझाव..

गुम : छह झामतला-बेनाडिनी के बीच की कोई पैसेंजर रेल थी, दुलुक-दुलुक की चाल ऐसे चल रही थी मानो कोई मंज़ि‍ल हो भी तो उस तक पहुंचने के लिए अनंत तक का समय हो. मुझे एक इंडोनेशियाई लोकगीत (जिसने कीरगीज़ गांवों की भी कभी भटकी, भूली घुमाई की हो) गुनगुनाता छोड
 
Pramod Singh
पसंद करें
3
नापसंद करें

बहुत भूख लगनेवालों की कहानी..

गुम : पांच बूढ़ी दिखी तो बोलती हुई ही दिखी. जाने संबलपुरिया बोल रही थी या गंजाम वाली ज़बान . जुसेप्पे‍ गौर से कभी उसे तो कभी धीमे-धीमे हमारे गिर्द इकट्ठा होती भीड़ को पढ़ता रहा, जबकि मेरे मन में बुढ़ि‍या के तंबाकू से एकदम काले पड़ गए दांत कहीं गड़कर
 
Pramod Singh
पसंद करें
5
नापसंद करें

छुक छुक छुक छुक..

कालीबाड़ी की भीतर की गलियों में जाने इसाइयों के किस पंथ की एक पुरानी, ललहर, साहबों की बंगलानुमा इमारत है, होंठों के ऊपर एक भूरा, भारी मस्सा और हल्के उग आये मूंछों की सजावट वाली एक बूढ़ी नन से जुसेप्पे जिरह कर रहा है, मैं गांजे की टुनक में उनींदा मिशन
 
Pramod Singh
पसंद करें
5
नापसंद करें

दैट इज़ अबाउट ऑल देयर इज़!

अपने-अपने मन की अनूठे, अंगूठी के जादू में खोये जन, गन को इससे क्या फर्क़ पड़ता कि वह पुराने मखमल के टुकड़े में लपेटे क्लैरिनेट कुरियर को जानते थे, नहीं जानते थे? जानते थे तो कितना जानते थे और नहीं जानते थे तो क्यों नहीं जानते थे. हां, निकोलस यादव को
 
Pramod Singh
पसंद करें
5
नापसंद करें

समय पीछे जाकर भी कितना पीछे जाता है?..

एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल की सीढ़ि‍यां उतरते नयनमोहन घोषाल ने थके-हारे स्वर ऐलान किया, ‘क्या फरक पड़ता क्लैरिनेट-मैन किदर गुमा, कोन समय गुमा. हम हामारा बाड़ी सोब दिनेइ होताम, किंतु सोत्ती‍ अगर आप जिग्या‍सा करेन, क्वेश्चेन पुट करेन तोमाय कोथाय पावा ज
 
Pramod Singh
पसंद करें
8
नापसंद करें

गुम..

सन् अट्ठारह सौ तीस के आसपास की घटना है, या शायद कल रात के आखिरी पहर के दरमियान की कभी, कहना मुश्किल है. तथ्यत: मुश्किल इसलिए भी है कि मखमल के एक पुराने कपड़े में क्लैरिनेट लपेटे दक्षिणी बिहार में भटकते जिस शख्‍स का किस्सा है वह अभी भी लापता है. नयनमो
 
Pramod Singh