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बिना पतेवाला पोस्टकार्ड

जब भी कोई पत्र लेकर महेन्द्र भाई की दुकान पर जाता हूँ तो पहले तो वे और उनका बेटा नितिन खुश होते हैं और अगले ही क्षण ताज्जुब में डूब जाते हैं। महेन्द्र भाई का पूरा नाम महेन्द्र जैन (पाणोत) है और नगर के प्रमुख व्यापारिक क्षेत्र में उनकी, स्टेशनरी की
 
विष्णु बैरागी
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दादाजी का व्यवहार और मेरा भय

‘हाँ भई! हाँ, मुझे तो इस घर में होना ही नहीं चाहिए।’ अड़सठ वर्षीय दादाजी क्षुब्ध, कुपित और आक्रोशित होकर अपने, दस वर्षीय पोते पर कटाक्ष कर रहे थे-घर के बाहर, ऐन सड़क पर आकर। इतनी जोर से कि आसपासवाले और आने-जानेवाले, न चाहकर भी सुन लें। ऐसा ही हुआ भी। सुनकर
 
विष्णु बैरागी
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मैं अकेला तो नहीं?

जीवन में सब कुछ प्रिय और मनोनुकूल नहीं होता। आपका नियन्त्रण केवल आप पर ही होता है, अन्य पर नहीं। ऐसे में, आप कितने ही ‘समय-पालनकर्ता’ हों, दूसरे भी वैसे ही हों, यह अपेक्षा और आग्रह ही कर सकते हैं। इससे अधिक कुछ भी नहीं। किन्तु अपेक्षा तो दुःखों का मू
 
विष्णु बैरागी
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यह मूर्खता अब नहीं करूँगा

सुने, बोले, लिखे, पढ़े गए शब्दों के साकार होने की प्रक्रिया का भागीदार बनना रोमांचक अनुभव है। मैं अभी-अभी ऐसी ही अनुभूति से गुजरा हूँ। सम्भव है, इस सबमें अनोखा, अनूठा, सारगर्भित कुछ भी न हो। फिर भी ऐसे रोमांच को सार्वजनिक करने से मैं स्वयम् को रोक नही
 
विष्णु बैरागी