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तुम-हम नहीं पाल सकते कबूतर

तुम-हम नहीं पाल सकते कबूतर सूचना प्रौद्योगिकी के विस्फोट ने दुनिया को गाँव में बदल दिया। अंगुलियों के पोरों पर दुनिया सिमट आई। ‘सात समन्दर पार’ वाले जुमले आज के बच्चों के लिए चुटकुले से अधिक नहीं रह गए। किन्तु उलटबासियाँ शायद सर्वकालिक होती हैं। यह अलग
 
विष्णु बैरागी
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दुर्जनों का सम्मान

मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि अन्ततः हम लोग चाहते क्या हैं? हम सोचते कुछ हैं, बोलते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। हमारे संकटों का कारण कहीं हमारी अस्थिरचित्तता तो नहीं?मेरे कस्बे से प्रकाशित हो रहे साप्ताहिक ‘उपग्रह’ में मैं मेरा स्तम्भ ‘बिना विचारे’
 
विष्णु बैरागी
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हाट में सरस्वती

‘सात लाख?’ सुनकर मैं मानो धड़ाम् से गिरा। लगा, फोन के चोंगे में ज्वालामुखी फूट गया है और लावा बह कर मेरे कानों में समाए जा रहा है। मैं बहरा हो गया हूँ। कानों से बहता हुआ लावा मेरे मुँह में आ पहुँचा है। मेरी जबान जल गई है। मैं बहरा ही नहीं, गूँगा भी हो
 
विष्णु बैरागी
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परम नहीं, ईश्वर आया मेरे घर

‘काकू! देखो, फोन बन्द मत करना। मेरी पूरी बात सुनना। तीस सालों से आप मुझसे कन्नी काट रहे हो। मुझे टाल रहे हो। मेरे खिलाफ भले ही कुछ नहीं कहते हो किन्तु मेरा नाम सुनना, मेरी बात करना पसन्द नहीं करते हो। लेकिन आज मैं बिलकुल वैसा हो गया हूँ जैसा आपने तीस साल
 
विष्णु बैरागी
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हम सब, निहालसिंह

इन दिनों निहालसिंह चर्चा में हैं। शायद ही कोई अखबार और समाचार चेनल बचा हो जिसने निहालसिंह की चर्चा न की हो। किसी ने कम, किसी ने अधिक, किन्तु चर्चा की सबने। एक समाचार चैनल ने निहालसिंह पर आधे घण्टे का विशेष कार्यक्रम प्रस्तुत किया और थोड़े-थोड़े अन्तराल
 
विष्णु बैरागी
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वरुण के बच जाने से उपजी खुशी

रीमा और वरुण मुझे चमत्कृत किए जा रहे हैं। मेरी कुछ धारणाओं को झुठलाए जा रहे हैं। कोई तीन-साढ़े तीन वर्षों से दोनों को ध्यान से देख रहा हूँ। प्रतिदिन उनके साथ कुछ समय गुजारना पड़ रहा है। कभी आधा घण्टा तो कभी एक घण्टा तो कभी इससे भी अधिक। जब भी उनके पास से
 
विष्णु बैरागी
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वृद्धाश्रम: मकान या मानसिकता

‘काल बेल’ की आवाज से ही नींद खुली। घड़ी देखी, अभी साढ़े छः ही बजे थे। दरवाजा खोला तो विश्वास नहीं हुआ। काका साहब सामने खड़े थे! उन्हें कोई वाहन चलाना नहीं आता। सायकिल भी नहीं। याने, लगभग सत्तर वर्षीय काका साहब, त्रिपोलिया गेट से कोई तीन किलोमीटर पैदल चलकर,
 
विष्णु बैरागी
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इलाज की नई, ‘विकट पद्धति’

‘विकटजी’ कुपित हैं। नहीं। कुपित कम और क्षुब्ध अधिक। झुँझलाहट से उबले जा रहे हैं। उनके साथ ‘यह सब’ करनेवाले दोनों लोगों का ‘किंचित मात्र भी’ नहीं बिगाड़ पाने की झुंझलाहट से। क्रुद्ध, बिगड़ैल साँड की तरह फूँ-फूँ करते हुए कभी मोहल्ले की चाय की गुमटी पर बैठ
 
विष्णु बैरागी
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लोकतन्त्र के बाराती

हम सात-आठ थे। सबके सब पूरी तरह फुरसत में। करने को एक ही काम था - भोजन करना। सबको पता था कि छः बजते-बजते भोजन की पंगत लग जाएगी। याने प्रतीक्षा करने का काम भी नहीं था। सुविधा इतनी और ऐसी कि माँगो तो पानी मिल जाए, चाय मिल जाए-सब कुछ फौरन। नीमच के डॉक्टर
 
विष्णु बैरागी
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उन्होंने अनुचित का समर्थन किया

नीमच जाने के लिए मैं इन्दौर-उदयपुर रेल में यात्रा कर रहा था। मन्दसौर में ‘उन्हें’ अपने डिब्बे में चढ़ता देख तबीयत खुश हो गई। ‘वे’ मेरे आदरणीय तो हैं ही, समूचे मालवांचल के ख्यात और सुपरिचित पत्र लेखक हैं। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब ‘उनका’ कोई न कोई पत्र,
 
विष्णु बैरागी
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वे बताएँगे और मनवाएँगे हमारे त्यौहार

क्या धुलेण्डी और क्या रंग पंचमी! दोनों ही इस बार लगभग बेरंगी निकलीं। कोई दूसरा त्यौहार होता तो इतना नहीं खटकता किन्तु होली ही तो वह इकलौता त्यौहार है हमारा जिसमें सब एक रंग हो जाते हैं। बाकी सारे त्यौहार तो कहीं न कहीं सीमा रेखा खींचे रखते हैं। होली ही
 
विष्णु बैरागी
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उठावने का निमन्त्रण

चीजें अचानक नहीं बदलतीं। धीरे-धीरे ही बदलती हैं। इतनी धीरे-धीरे कि उनके बदलने का आभास भी नहीं होता। यह धीमापन, बदलाव को स्वाभाविकता प्रदान करता लगता है। किन्तु वह परिवर्तन ही क्या जो अपने होने की प्रतीति न कराए! सो, यह प्रतीति होती तो है किन्तु अचानक ही।
 
विष्णु बैरागी
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प्रतिभा पाटिल बनाम झमकू

मेरे जिले की, जनजातीय (भील) समाज की सागुड़ी, रुपली, भागूड़ी, झमकू, दरली, तीजड़ी, फुन्दी और ऐसी ही अन्य कई स्त्रियों ने अनायास और अचानक ही, राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल की बराबरी कर ली। इससे पहले वे एक मामले मे ही उनके बराबर थीं। अब दो मामलों
 
विष्णु बैरागी
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मालवा का महाकाल

याद नहीं आता कि निगम साहब से इस बार का मिलना कितने बरसों बाद हुआ। लेकिन मिलने पर पाया कि वे वैसे के वैसे ही हैं जैसे कि कुछ बरस पहले मिले थे। लगा, उन्होंने काल को अपनी मुट्ठी में बन्द कर नियन्त्रित कर लिया हो।मैं बात कर रहा हूँ उज्जैन निवासी डॉ। श्याम
 
विष्णु बैरागी
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एकान्त के बुनकर

उस दोपहर तेज बरसात हो रही थी। बरसात के तेवर देखने बाहर आया तो देखा-आचार्यजी सामनेवाले मकान के बरामदे में खड़े हैं। आचार्यजी याने सेवा निवृत्त प्राध्यापक डॉक्टर मणीशंकरजी आचार्य। हिन्दी के ज्ञाता, एकाधिक पुस्तकों के रचयिता, ऑरो आश्रम को समर्पित। आचार्य
 
विष्णु बैरागी
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ये अनूठे ‘अपनेवाले’

आप तो अपनेवाले हैं’ जैसी ‘भावनात्मक भयादोहन’(इमोशनल ब्लेकमेलिंग) करने वाली दुहाई देकर, अपनेवालों का, मुतखोरी की सीमा छूने वाला, आर्थिक, सामाजिक शोषण करनेवालों को लेकर, 8 अगस्त 2008 की ----शीर्षक मेरी पोस्ट डॉ.सत्यनारायण पाण्डे ने बरबस ही याद दिला दी।
 
विष्णु बैरागी
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किसकी कथा है यह?

कह नहीं सकता कि यह कथा सागर बाबू की है अथवा नहीं। किन्तु वे इस कथा के जनक-सूत्र अवश्य हैं। यह उनका वास्तविक नहीं, काल्पनिक नाम ही है। श्रेष्‍ठी समाज के प्रतिष्ठित सागर बाबू अपने कस्बे के अग्रणी व्यापारी हैं। व्यवहार के साफ और बात के धनी। उन्होंने दन्
 
विष्णु बैरागी
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वह रोहित की सगी माँ ही थी

शाम हुई नहीं थी। होने ही वाली। दिन भर का थका मैं, घर लौटा था। कपड़े बदल कर पाँव फैलाए ही थे कि दरवाजे पर रोहित प्रकट हुआ। बिना किसी भूमिका के, हाँफता-हाँफता बोला - ‘मेरी मम्मी की पालिसी चालू कर दो और वारिसों में मेरा नाम भी जोड़ दो।’ मुझे सम्पट नहीं पड़
 
विष्णु बैरागी
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चन्दू भैया की गैस एजेन्सी पर

मैं जब चन्दू भैया के चेम्बर में पहुँचा तो समूचा दृश्य तनिक विचित्र और वातावारण असहज तथा भारी था। एक व्यक्ति अत्यन्त अशिष्ट मुद्रा में और उससे भी अधिक अहंकारी भाव-भंगिमा से खड़ा था-ऐसे, मानो चन्दू भैया के चेम्बर में आकर और चन्दू भैया को काम बता कर उसने
 
विष्णु बैरागी
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‘रोन्या’ और रोतल्या’: मैं

बार-बार, बात-बे-बात रोने वाले को मालवी में ‘रोन्या’ और ‘रोतल्या’ कहते हैं। चिट्ठा जगत के कृपालु मुझे ‘रोन्या’ या ‘रोतल्या’ कहें तो मुझे तनिक भी (निमिष मात्र को भी) बुरा नहीं लगेगा। यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मेरी कुछ पोस्टों पर एकाधिक कृपालुओं ने, म
 
विष्णु बैरागी