क्या लिखूं ? सुनते आये हैं कि सच को जीना जितना मुश्किल है उस से भी मुश्किल उसको ईमानदारी से बयां करना ..... लेकिन सच बोलने से हमें गुरेज़ नहीं ....हरिश्चंद्र टाइप इंसान तो नहीं लेकिन हाँ! यूँ ही रोज़मर्रा की छोटी - छोटी बातों पर दिन में पंद्रह बार बेवजह
बाटों खुशियाँ इस जीवन में,कल को किसने देखा है;यही सत्य है इस जीवन, बाकी सब धोखा है ;उद्यम करो सत्कर्मों का, दुष्कर्मों से दूर रहो;जन्म म्रत्यु के भय को त्याग करो, जीवन से भरपूर रहो;कर्म से किस्मत को जोड़ो,भाग्यवाद का त्याग करो;दीन-हीन की सेवा से ,जीवन
हिन्दी सिनेमा का स्वर्णकाल (पचास और साठ के दशक) पिताजी के जीवन का भी स्वर्णकाल था क्योंकि वे उस समय युवा थे और नयी-नयी शादी हुयी थी. अपने खानदान क्या, पूरे गाँव में अपनी पत्नी को अपने साथ शहर लाने वाले पिताजी पहले युवक थे. नहीं तो उस समय पिया लोग कमाने
पिताजी ने पढ़ाई पूरी करते ही घर छोड़ दिया था. वे वहाँ से बाहर निकलकर कुछ करना चाहते थे और अपनी ज़िन्दगी अपने ढंग से जीना चाहते थे. गाँव की कुरीतियों और अन्धविश्वासों से उनका मन भी ऊबा था. फिर तब खेती में बहुत श्रम करने पर भी कम आय होती थी और सिर्फ़ लोगों
जीवन कि सच्चाई नयी कोंपले हवा के इक झोंके को छु कर मुस्करा रही, इठला रही, इसे देख कर लाल-पीली पत्तियों ने कहा कि जरा नीची देखोजो नीचे है, हुआ करती थी जहाँ तुम हों आज, बिछड़ गयी हमसे आज ये प्यारी तो कल होगी हमारी और
सन १९८२ के आस पास का मसला है, मैं अक्सर मैनहन के दक्खिन बहती नहर में नहाने जाता था, एक दिन एक अदभुत व्यक्तित्व वाला मनुष्य जिसने शरीर को केसरिया रंग के कपड़ों से ढ़्क रखा था, चला आ रहा था मेरी ओर, चूकि बचपन से अभिवादन करने का संस्कार मेरे भीतर पैबस्त किया
मेरे पुराने मित्र ने अपने क्वचिदन्न्योपि नामक चिट्ठे पर कुछ इस अंदाज से मेरी चर्चा की , कि मुझे भी कुछ दिनोंतक व्यामोह हुआ कि मैं रसिकप्रिय तथा आधुनिक सन्दर्भों में कुछ कुछ हृतिक रोशन जैसा हूँ लेकिन कुछ दिनों केचिंतन के बाद मुझे ऐसा लगा कि भाई अरविन्द जी
चीन के बांस को उगाना बड़ा दुरूह कर्म है. इसका छोटा सा बीज लेकर आप इस बोते हैं और साल भर तक इसे पानी और खाद देते हैं, लेकिन कुछ नहीं होता.
दूसरे साल भी आप इसे पानी और खाद देते हैं, लेकिन कुछ नहीं होता.
तीसरे साल भी आप इसे पानी और खाद देना ज़ारी रखते [.
पु. लं. च्या अखेरच्या प्रवासाबद्दलचा एक सुरेख लेख दै. लोकसत्तेत श्री. कुमार जावडेकरांनी लिहिला होता. पु. लं. च्या शैलीची पदोपदी आठवण करून देणारा हा लेख --'हॉस्पिटल' हा शब्द ऐकला की माझ्या काळजाचा (की हृदयाचा?) ठोका चुकतो. त्यामुळे डॉक्टरांनाही मी आजारी
"जो त्या क्षणी उत्कटपणे आकंठ जगला त्याला नंतरच्या आयुष्यातल्या अनेक तापदायक क्षणांना सुसह्य करता येतं. निरपेक्ष प्रेमानं काही व्यक्ती आपलं जगणं समृध्द करून जातात , पुढे आपण त्याच पुंजीवर जगत असतो "- प्रविण दवणे. (" अत्तराचे दिवस " )