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महेंद्र के छायाचित्र-9

Share पाठक साथियों नमस्कार  जीवन में बहुत सारी भागादौड़ी है मगर एक बात साफ़ है कि हमारा भी दिल करता है  कुछ समय  निकाल कर हम फुरसत  में कहीं घूमने जाएँ. यहाँ अपनी माटी अपनी अमूल्य प्रकृति के कुछ छायाचित्र पोस्ट कर रहा है ये  एक
 
माणिक
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महेंद्र के छायाचित्र-7

Share पाठक साथियों नमस्कार  जीवन में बहुत सारी भागादौड़ी है मगर एक बात साफ़ है कि हमारा भी दिल करता है  कुछ समय  निकाल कर हम फुरसत  में कहीं घूमने जाएँ. यहाँ अपनी माटी अपनी अमूल्य प्रकृति के कुछ छायाचित्र पोस्ट कर रहा है ये  एक
 
माणिक
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महेंद्र के छायाचित्र-10

Share पाठक साथियों नमस्कार  जीवन में बहुत सारी भागादौड़ी है मगर एक बात साफ़ है कि हमारा भी दिल करता है  कुछ समय  निकाल कर हम फुरसत  में कहीं घूमने जाएँ. यहाँ अपनी माटी अपनी अमूल्य प्रकृति के कुछ छायाचित्र पोस्ट कर रहा है ये  एक
 
माणिक
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चित्रकारी का अनोखा रंग-2

Share साथियों  हम कोशिश कर रहें है कि आपके लिए समय-समय पर कुछ ख़ास प्रकार के चित्र .पहुंचाएं ,जो कहीं न कहीं हमारी अपनी माटी  से जुडी कहानी बयां करते है.हमारा रंग-बिरंगा जीवन  वाकई बहुआयामी है,इसके जितने रंग देखे जाए उतना आनंद और ज्यादा
 
माणिक
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चित्रकारी का अनोखा रंग-1

Share साथियों  हम कोशिश कर रहें है कि आपके लिए समय-समय पर कुछ ख़ास प्रकार के चित्र .पहुंचाएं ,जो कहीं न कहीं हमारी अपनी माटी  से जुडी कहानी बयां करते है.हमारा रंग-बिरंगा जीवन  वाकई बहुआयामी है,इसके जितने रंग देखे जाए उतना आनंद और ज्यादा
 
माणिक
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महेंद्र के छायाचित्र-8

Share पाठक साथियों नमस्कार  जीवन में बहुत सारी भागादौड़ी है मगर एक बात साफ़ है कि हमारा भी दिल करता है  कुछ समय  निकाल कर हम फुरसत  में कहीं घूमने जाएँ. यहाँ अपनी माटी अपनी अमूल्य प्रकृति के कुछ छायाचित्र पोस्ट कर रहा है ये  एक
 
माणिक
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महेंद्र के छायाचित्र-6

Share पाठक साथियों नमस्कार  जीवन में बहुत सारी भागादौड़ी है मगर एक बात साफ़ है कि हमारा भी दिल करता है  कुछ समय  निकाल कर हम फुरसत  में कहीं घूमने जाएँ. यहाँ अपनी माटी अपनी अमूल्य प्रकृति के कुछ छायाचित्र पोस्ट कर रहा है ये  एक
 
माणिक
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‘बुर्ज खलिफा’

‘बुर्ज खलिफा’ नाम तो सुनाही होगा…हो तीच ती विक्रमी अशी जगातली सर्वात उंच इमारत.(पुर्वीच नाव ’बुर्ज दुबई’) ८२८ मी. उंची असलेली हि इमारत थेट आकाशाला भिडणारी अशीच आहे.’बुर्ज खलिफा’ला ऐकुण १६२ मजले असुन प्रतिसेकंद १० मीटर वेगाने
 
देवेंद्र
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स्‍वागत 2010

पहली किरण पहली अंगड़ाईअभी आलस गया नहींपहला सजदाचलो अब उड़ें
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शहर को पीठ

पिछले पोस्‍ट में जहां से खड़े होकर निर्माल्‍य कलश दि‍ख रहा था, जहां कूड़ा कलश के बाहर था और कूड़ा बीनते बच्‍चे कलश में घुसे से हुए थे। मानो उनके महानगर में शामिल होने का रास्‍ता निर्माल्‍य कलशों से होकर ही जाता है। इसी जगह से नजर ऊपर उटाई जाए तो सड़क
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निर्माल्‍य कलश

यह चित्र मुंबई के वरली इलाके का है. समुद्र इस जगह से सटा हुआ है. थोड़ी थोड़ी दूर पर नेहरू सेंटर, स्‍पोर्ट्स स्‍टेडियम, रेस कोर्स है. गर्दन घुमाएंगे तो हाजी अली की दरगाह द‍िखेगी. ईंट की दीवार के उस तरफ सड़क है जो बहुत व्‍यस्‍त रहती है और ऐसी गाडि़यां
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आजची गंमत

आता किमान चार पोस्टतरी बागेतला फोटो टाकायचा नाही असं मी ठरवलं होतं. पण असं काही बघितलं, की फोटो काढावाच लागतो, आणि तो मनासारखा आल्यावर पोस्टल्याशिवाय चैन पडत नाही :)मोठ्या आकाराच्या फोटोसाठी वरच्या फोटोवर टिचकी मारा.कळीशेजारच्या कवडीसारख्या आकारावरचा तो
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अबोली बोलते तेंव्हा ...

जूनमध्ये जांभळ्या अबोलीचं एक रोप आणलं. आणल्यापासून ही अबोली गप्प गप्पच होती. आमच्या गच्चीतला वारा सहन झाला नाही का हिला? का ऊन कमी पडतंय? नवं घर काही तिच्या पसंतीला उतरलेलं दिसत नव्हतं. दोन आठवडे झाले तरी अबोली काही हसली नव्हती. उदास उदास, एकटी वाटत
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मुंबईची शांघई

हल्ली मुंबईची शांघई करण्याच्या गप्पा - की वल्गना - वारंवार ऐकू येतात. कानाला गोड लागतं, डोळ्यांत रम्य स्वप्नं तरळू लागतात, ओठांवर 'तथास्तु' येतं - आणि तेव्हढ्यात हे चित्र पाहायला मिळतं:मुंबईच्या कुर्ला उपनगराचे हे चित्र अधिक परिणामकारकपणे त्याच्या मूळ
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राजाचं वस्त्रहरण

आपलं म्हणणं खरं ठरलेलं पाहून कोणाला आनंद होणार नाही? तरीही कधी कधी आपण खोटं पडावं असं फार फार वाटतं. वानगीदाखल मी सचिन तेंडुलकरविषयी इथे व इथे लिहिलं आहे ते घ्या. निदान विश्व-चषकात तरी सचिनने माझे शब्द माझ्या घशात घालावे अशी इच्छा होती. पण तसं होणं
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पूल

निर्जन पूलOriginally uploaded by Milind9. एक निर्जन, धुक्यात लपेटलेला पूल. वेळ तिन्हीसांजेची की पहाटेची कळत नाही. विषण्ण, उदास वातावरण, काहीसं नीट न आठवणाऱ्या स्वप्नासारखं ज्यात मी एकटा, एकाकी असतो. भोवती माणसं शोधत असतो अयशस्वीपणे, वेड्यासारखा.