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चोट

चोट ताज़ा है अभी , थोडा मुस्कुराने दो !वकत लगेगा अभी ,दर्दे दिल सुनाने को !गुमा नहीं था, इस कदर चोट खायेंगे ,ठगे से रह गए , बस तिलमिलाने को !लम्हें चुनने दो , ख्यालों के खंज़र से ,लुटे हैं कितने , हिसाब तो लगाने दो !जितने चाहो , किस्से बुनते रहना ,सच
 
sanjeev kuralia
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