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प्रेम जीवन और गृहस्थ जीवन में अंतर होता है-हिन्दी आलेख (love life and home life-hindi editorial)

वह लड़की एक पत्रकार थी और अपने परिवार से दूर रहती थी। उसने अपनी जाति से इतर एक युवक से प्रेम किया किया था। वह प्रेम विवाह करने की इच्छुक थी पर उसके परिवार के लोग इसके लिये तैयार नहीं थे। अंततः वह लड़की अपने प्रेमी को छोड़कर अपने घर आयी और वहां उसकी संदिग्ध
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क्या कंप्यूटर सोच-विचार कर सकता है?

हे मानवश्रेष्ठों,पिछली बार हमने भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों पर, थोड़ी सी कम रूचिपूर्ण पर एक महत्वपूर्ण प्रास्थापना पर चर्चा की थी। इस बार जैसा कि पिछली बार कहा था, हम देखेंगे कि चिंतन और चेतना को कंप्यूटर के संदर्भ में हम कहां पाते हैं। क्या
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भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता का सापेक्ष स्वभाव

हे मानवश्रेष्ठों,पिछली बार हमने मानव चेतना के आधार के एक रूप में भाषा और इसके जरिए चिंतन के विकास पर चर्चा की थी। इस बार हम भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों पर, थोड़ी सी कम रूचिपूर्ण पर एक महत्वपूर्ण प्रास्थापना पर चर्चा करेंगे। चेतना पर शुरू हुई यह
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भाषा और चिंतन

हे मानवश्रेष्ठों,पिछली बार हमने मानव चेतना के आधार के रूप में श्रम की महत्वपूर्णता और उपयोगिता पर विचार किया था। इस बार हम, मानव चेतना के आधार रूप के एक और महत्वपूर्ण पहलू यानि मानव की भाषा और इसके जरिए चिंतन के विकास पर चर्चा करेंगे। चलिए आगे बढते हैं।
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हैप्पी होली हैप्पी होली हैप्पी होली

अल सुबह सूरज ने आँख खोली धरती के माथे कुंकुम  और रोली भँवरे गायें तो कलियाँ भी बोली ब्रज में घूमे रसिओं की टोली अब आपके चेहरे पर भी तो मीठी मुस्कराहट हिल डोली  तो बोलो हैप्पी होली, हैप्पी होली सभी ब्लॉगर बांधवों और पाठकों को होली की
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क्या हम सभी दोगले हैं ?

                                  दीपावली के समय की बात है । ( आप कहेंगे यह होली के समय
 
शरद कोकास
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मदन महोत्सव पर भी कुछ लिखो-पढो बंधुओं

अक्सर प्रश्न उठता है कि प्रेम क्या है। आज तक प्रेम की कोई सर्वसम्मतपरिभाषा नहीं निकल पाई। इतना जरूर है कि प्रेम को ढाई अक्षरों का नाम देकर किताबों में समेट कर रखा नहीं जा सकता।जब सोणी ने महिवाल का हाथ थामा होगा अथवा हीर ने रांझे को चाहा होगा, तब कबीर
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बायां री बंशी बाजैला, अलगोजो ठण्डो भायां रो...

 जिला परिषद एवं पंचायत समिति चुनाव में महिलाओं का दबदबाबायां री बंशी बाजैला, अलगोजो ठण्डो भायां रो।मोट्यारां नीची मूंछ करो, आयो राज लुगायां रो॥जालोर। पचास प्रतिशत आरक्षण का तोहफा मिलने के बाद इस बार जालोर जिले के पंचायतीराज चुनावों में नारी सशक्त
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मनुष्य और पशुओं के मानस में भेद

हे मानवश्रेष्ठों,पिछली बार हमने मानसिक कार्यकलाप के भौतिक अंगरूप में, मस्तिष्क को समझने की कोशिश की थी। जैसा कि पिछली प्रविष्टियों में बार-बार मानव व्यवहार का पशुओं के साथ तुलनात्मक उल्लेख होता रहा है, यह समीचीन और रोचक रहेगा कि हम मनुष्य और पशुओं के बीच
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मानसिक कार्यकलाप के भौतिक अंगरूप में, मस्तिष्क

हे मानवश्रेष्ठों,पिछली बार हमने मन, चिंतन और चेतना में अंतर तथा मानसिक और दैहिक, प्रत्ययिक और भौतिक को समझने की कोशिश की थी। इस बार हम मानव चेतना की विशिष्ट प्रकृति पर चर्चा शुरू करते हुए, मानसिक कार्यकलाप के भौतिक अंगरूप में, मस्तिष्क को समझने की
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मन, चिंतन और चेतना

हे मानवश्रेष्ठों,पिछली बार हमने यथार्थता के सक्रिय और निष्क्रिय परावर्तन में अंतर को समझने की कोशिश की थी। इस बार हम परावर्तन के विकास की अब तक की चर्चा को भी संदर्भित करते हुए मानसिक और दैहिक, प्रत्ययिक और भौतिक संदर्भों में, ‘मन’ की संकल्पना को समझने
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एक पाती वीरम चौकी से

कहने को तो मैं एक सूरमा द्वारा कुछ पत्थरों से बनवाई गई वह चौकी हूं, जहां से वह अपने राज्य पर नजर रखता था। यहीं से उसे आने वाले खतरे की खबर होती थी। कहा जाए तो मैं उसकी खबरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थान थी। पता नहीं क्यों आज काल की निर्दय शमां पर चढ़े उस
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चेतना के स्वर उजाले की ओर

मैं वीरमदेव चौकी। वीर वीरमदेव द्वारा राज्य पर नज़र रखने के उद्देश्य से बनवाई गई, लेकिन उसके बाद सदा उपेक्षित रही। मैं क्या सारा दुर्ग ही तो उपेक्षित है। दुर्ग को सुधारने की बात आती है तो कई अधिकारी और राजनीति उस सूरमा के बलिदान दिवस पर यहां आते हैं, लेकिन
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