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मर्सियों के बीच एक छोटी सी टीप

(आज सुबह से जहां गया बंगाल के स्थानीय निकायों के चुनावों का तिया-पांचा हो रहा है। इनमें हुई वाममोर्चे की शिकस्त को यूं पेश किया जा रहा है जैसे कि बस्तील ढह गया।ठीक भी है…इतनी लंबी पारी के बाद पहली बार  इस क़दर बीट हुए हैं कि आऊट होने का ख़तरा साफ़
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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काहे की जनता जनार्दन

भारत में लोकतंत्र है, कहने को दुनिया सबसे बड़ा लोकतंत्र। यहां सरकार को जनता चुनती है। आम और खास लोग मिलकर यह तय करते हैं कि उन पर कौन राज करे। जिसे जनता चुनती है वही राज करता है। चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष हो इसके लिए चुनाव आयोग न जाने क्या-क्या प्रयास
 
pankaj mishra
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भैरोंसिंह शेखावत का देहावसान:हमारी भविष्यवाणी सही साबित

जय श्री राम ............ | आदरणीय मित्रो,आप से कल रू-ब-रू होना था,मगर किसी अपरिहार्य कारण से न हो सके | आज हो रहे हैं,मगर आज अब वह चर्चा नहीं कर पाएँगे,जो कि करने को सोच रखी थी | अब हम यहाँ एक दूसरी बात करेंगे | जैसा कि आप को भली भाँति विदित हो ही चुका
 
डॉ.कुमार गणेश 369 (DR.KUMAR GANESHE 369)
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अजेय भारत के निर्माण के लिए... Unbeatable India

दंतेवाड़ा में हुए नक्सली हमले में देश के 76 फौजी मारे गए । ये सभी एक एन्टी माइन वाहन में बैठकर नक्सलियों के सफ़ाए के लिए जंगल की तरफ़ जा रहे थे । इनके वाहन को नक्सलियों ने ‘माइन’ से ही उड़ा दिया। इतनी मौतों के बाद ‘विशेषज्ञों’ ने बताया कि इन फ़ौजियों को इस
 
DR. ANWER JAMAL
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लोहिया, एक बहु आयामी व्यक्तित्व

कुर्बान अली भारत में समाजवादी आंदोलन के संस्थापकों में से एक और राष्ट्रीय आंदोलन के एक प्रमुख हीरो डा. राम मनोहर लोहिया का यह जन्मशताब्दी वर्ष है। डा. लोहिया ने इस देश को आजाद कराने के अलावा स्वतंत्रता के बाद हुई राजनीति में एक अहम रोल अदा किया और देश की
 
अभिनव उपाध्याय
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बसपा या सत्ता की कामयाबी ?

आज बसपा जब अपनी प्रमुख मायावती का जन्मदिन मनाने जा रही है तो उसके लिए इस जन्मदिन के खास मायने इसलिए भी हैं क्योंकि प्रदेश के इतिहास में पहली बार किसी दल ने विधान परिषद् चुनावों में इतनी बड़ी कामयाबी दर्ज की है. इन चुनावों में विपक्षी दल सरकारी गुंडागर्दी
 
डा०आशुतोष शुक्ल
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एक घटिया व्यक्ति को चुनने के लिए इतनी कसरत… बाप रे बाप?

  जनवरी की बेहद सर्द रात… एलार्म की घण्टी भोर में साढ़े चार बजे बज उठी है। घर के तीनो मोबाइल सेट एक साथ बजे हैं। तीनों में एलार्म इस लिए सेट किए कि कहीं कोई चूक न हो जाय। मामला इतना संवेदनशील है कि तैयार होकर साढ़े पाँच बजे तक हर हाल में निकल पड़ना है।
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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बदलाव की त्रासदी

देश में इस समय एक बेहद खतरनाक गठजोड़ बन गया है। इस गठजोड़ में नेता, नौकरशाह, मीडिया, कॉरपोरेट घराने, अपराधी और ठेकेदार शामिल हैं। सामान्य कार्यकर्ता इन परिस्थितियों से इस कदर हताश हो गया है कि वह भी इसी गठजोड़ में अपनी हिस्सेदारी ढूंढने लगा है। क्योंकि उसे
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नेताजी का मोबाइल ...3 [ नौकरशाही..]

आ चार संहिता लग गई ..... तो क्या हुआ ?  काम थोड़े ही रुक जायेगा !! ....ये सरकारी अधिकारी तो बस बहाना ढ़ूढ़तै हैं...... काम नहीं करने का. चलो अभी मिलवाता हूँ..... नेताजी से. छोटी-छोटी आँखों को जबरदस्ती विश्वास दिलाने के उपक्रम में बड़ी करता हुआ ए
 
समीर यादव
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नेताजी का मोबाइल......

एक राजनीतिक दल में समाज विशेष के स्वयंभू नेताजी चुनावों की घोषणा के बाद मीडिया को इंटरव्यू में पार्टी की संभावना और उसमें अपनी भूमिका पर खींसे निपोरते हुए कह रहे थे..." पार्टी ने अपने कार्यकाल में हमारे समाज का ख्याल रखकर खूब काम किया है, हम प्रचंड ब
 
समीर यादव
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नेताजी का मोबाइल - 2

ने ताजी सुबह से अपने एयरकन्डीशन कार से चुनाव क्षेत्र के दौरे पर हैं ....अब कहाँ चलना है..? भैयाजी, अयोध्या नगर..! अच्छा...गाड़ी पहले ही रोक लेना. भैया जी, वैसे भी गाड़ी अन्दर तो जायेगी नहीं.... रोड ही कहाँ है...!!! अबे, चुप्प्प....! बीच में ही किसी ने
 
समीर यादव
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लुटेरे हैं तैयार, कुर्सी खाली करो यार

काफी देर तक सोचता रहा, इस ब्लॉग का शीर्षक क्या लिखूं। गुरुघंटाल के हाथ आई सत्ता की चाबी, फिर कन्फ्यूज हो गई झारखंड की जनता, आदिवासी राज्य में फिर चलेगा जंगल राज वगैरह-वगैरह... झारखंड में चुनाव हो चुका है, तस्वीर साफ हो चुकी है या ऐसा भी कह सकते हैं क
 
शिवेंद्र चौहान
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फिर अधर में नतीजे

झारखण्ड मे जो चुनाव नतीजे आये है, उनसे चिंता बढ़ गयी है। किसी भी पार्टी को अकेले बहुमार नहीं मिलना एक बड़ी चिंता की बात है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा के साथ ही अगर झारखण्ड में चुनाव हुए होते तो बीजेपी को फायदा हो सकता था। लोकसभा चुनाव के समय बीजेप
 
ज्ञानेश उपाध्याय (gyanesh upadhyay)
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चुनाव सुधार....

देश के बड़े भूभाग को देखते हुए आज तक किसी भी तरह से यह नहीं किया जा सका कि आवश्यकता पड़ने पर चुनाव को आसानी से निपटा लिया जाता. आज के सूचना के युग में एक बात जो की जा सकती है वो यह कि मतदान को मोबाइल चुनाव वैन से संपन्न कराया जाये जिससे लगने वाले पैसे
 
डा०आशुतोष शुक्ल
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वोट देना अनिवार्य क्यों नहीं ?

स्थानीय निकाय चुनावों में मतदान को अनिवार्य घोषित करने के लिए गुजरात में जो प्रयास किये जा रहे हैं वे सराहनीय हैं। देश में जनता का जिस तरह से नेताओं और पार्टियों से मोह भंग हो रहा है उसे देखते हुए यह कदम बहुत आवश्यक था। अभी इसके परिणामों के बारे में
 
डा०आशुतोष शुक्ल
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आज नये लुटेरों को चुनने का पर्व है

अव्‍वल तो अपन ज्‍यादा बुद्धिजीवी चोचलों में फंसने के बजाय और क्‍यों हर किसी को वोट का इस्‍तेमाल करना चाहिए की बहस में पड़ने से इतर वोट डाल आते हैं....हमारे कुछ घनिष्‍ठों के बहिष्‍कारपूर्ण रवैये के बावजूद ...अब कोई वोट दे या ना दे हमारी बला से, हमने ठ
 
भुवनेश शर्मा
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झारखण्ड की व्यथा

झारखण्ड की व्यथा संजय मिश्राझारखण्ड में चुनाव हो रहे हैं । इसमे चुनाव के वे सारे रंग दिख रहे हैं जो हमारी खासियत बन गई है। राज्य के बाहर के लोगों को हैरानी हो सकती है कि चुनाव प्रचार के दौरान भ्रष्टाचार मुद्दा नही बन पाया। न तो इसमे राजनितिक दलों की
 
sanjay mishra
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कौन कहता है कि राजनीति का पतन हो रहा है...?

दस साल पहले संघ लोक सेवा आयोग के साक्षात्कार में एक सदस्य ने मुझसे पूछा था कि भारत के राजनेताओं और पश्चिमी देशों के राजनेताओं में मौलिक अन्तर क्या है? मेरे बायोडेटा में शायद यह देखकर कि मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी रह चुका हूँ उन्होंने मुझसे यह मुश्क
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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छोड़ कर, प्रिय समारोह, बाहर जाना

चा हता तो यह था कि रोज आप को कोटा नगर निगम चुनाव के दौरान राजनैतिक दलों, प्रत्याशियों और जनता के रंग-रूप का अवलोकन कराता।  मैं 76 दिनों की हड़ताल के दौरान न तो कहीं बाहर गया और न ही कमाई की।  अपने दफ्तर के कामों से होने वाली कमाई से तो आज क
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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पक्ष विपक्ष

पक्ष: चुनाव हुआ. नयी सरकार बनी. सरकार धर्मनिरपेक्ष है. आरक्षण के पक्ष में है, गरीबो के बारे में सोचती है, सब को सामान अवसर देती है!! विपक्ष: कार्यकारिणी की बैठक हुई, प्रेस से बातचीत हुई. हारे तू क्या हुआ फिर से खड़े होंगे, रचनात्मक विपक्ष की भूमिका म
 
प्रवीण
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पंजे से गंजा

कुछ दिन पहले .... शाम में ऑफिस से निकला । सामने सरसराता हुआ एक गाड़ियों का काफिला निकला । गाड़ियों पर झंडे , पोस्टर और न जाने क्या क्या । हवा को चीरती हुई लाउडस्पीकर की आवाज़ । दरअसल उन दिनों हरियाणा में चुनाव का प्रचार चल रहा था । सामने से निकलते काफिल
 
स्पाईसीकार्टून
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नार्मदेय ब्राह्मण समाज जबलपुर में चुनाव नहीं सिर्फ़ आम सहमति

श्री काशीनाथ बिल्लोरे श्री चन्द्र शेखर पारे v\:* {behavior:url(#default#VML);} o\:* {behavior:url(#default#VML);} w\:* {behavior:url(#default#VML);} .shape {behavior:url(#default#VML);} Normal 0 false false false MicrosoftInternetExplorer4 /* Style D
 
गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल'
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उखड़े फिर गढ़े मुर्दे

महाराष्‍ट्र में विधानसभा चुनाव का आगाज हो चुका है शायद इसीलिए मुंबई में विधानसभा चुनाव को भुनाने के लिए गुजरात कांग्रेस एक बार फिर गढ़े मुर्दे उखाड़ने लगी है. गैर स्‍वैच्छिक संस्‍थाओं और राजनैतिक दलों को चुनाव के दौरान पुराने मुद्दे जेहन में क्‍यों उ
 
उषा चांदना
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भारतीय लोकतंत्र में चुनाव सुधार - निष्कर्ष एवं सुझाव

आज इस शोध कार्य का निष्कर्ष अंक है , ब्लॉग पर शोध कार्य प्रस्तुत करने का विचार बहुत ही नाज़ुक था और कारण बहुत ही व्यापक, हिन्दी में अन्तर जाल खोजने पर बेहतर परिणाम आएं और उसमें हम भी भागीदार होना चाहते थे ।इस शोध कार्य के पिछले लेखों की लिंक यहाँ मौजूद है
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भारतीय चुनाव सुधार

पिछले अंक में हमने भारत में चुनाव प्रक्रिया को समझा , लोकतंत्र में संविधान को प्रमुख और सर्वोच्च मान कर लोकतान्त्रिक कार्यों का संचालन होता है, चुनाव प्रक्रिया में हम एक महत्वपूर्ण बात बताना चूक गए जिस पर हमारा ध्यान राज भाटिया जी ने एक टिपण्णी के मध्यम
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भारतीय लोकतंत्र की चुनाव प्रक्रिया

भारतीय लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया के अलग-अलग स्तर हैं लेकिन मुख्य तौर पर संविधान में पूरे देश के लिए एक लोकसभा तथा पृथक-पृथक राज्यों के लिए अलग विधानसभा का प्रावधान है।भारतीय संविधान के भाग 15 में अनुच्छेद 324 से अनुच्छेद 329 तक निर्वाचन की व्याख्या की
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चुनाव प्रक्रिया एवं चुनाव सुधार - शोध कार्य

क्रिकेट और चुनाव न होते तो भारत को एक बेरौनक देश कहा जाता। थोड़े-थोड़े अंतराल में यहां चुनाव होते रहते हैं, इतने बड़े देश में चुनाव संपन्न करवाना कोई मामूली बात नहीं है।गत 57 वर्षों में लोकसभा के लिए 15 आम चुनाव तथा विभिन्न राज्यों के लिए अनेक विधानसभा
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भौतिकता की चकाचौंध में नैतिकता का पतन

किसी फ़िल्म का डायलॉग है – ‘जान लेना ज़ूर्म है मगर सही समय पर जान लेना राजनीति ।’ वर्तमान समय में राजनीति विद्रुपता की सीमा को लाँघ चुकी है । इसके इस स्वरूप को देखकर स्वयं लज्जा भी लज्जित होने पर विवश हो जाती है । कहते हैं – ‘बचपन ही चरित्र निर्माण का आधार
 
त्रिपुरारि कुमार शर्मा
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व्यंग्य : 90 पैसा कहां जाता है?

राहुल भैया तो मात्र बोलते ही हैं, सोचते नहीं। और जो इनके भाषणों के बारे में सोचते या लिखते हैं उनकी जमात अलग ही है। इस जमात को ना तो किसी गरीब व गांव के विकास की आवश्यकता है और ना ही किसी गरीब के बारे में जानकारी रखने की जरूरत है।
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खट्टे-मीठे चुनाव परिणाम

जनसंघर्षों का साथ देने से राजनैतिक दल कामयाबी हासिल कर सकते हैं, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का 2 से बढ़ कर 20 सीट पाना इसका उदाहरण है। नन्दीग्राम, सिंगूर, लालगढ़ के आन्दोलनों ने वामदलों के तीस साल पुराने किले को हिला दिया।
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भाजपा क्यों हारी?

भाजपा की पराजय का कारण पूरे पांच वर्षों में उसकी संभ्रम की स्थिति के कारण उसके प्रति एक नकारात्मक छवि का निर्माण होना रहा। जैसे संसद सत्र के दौरान अधिक समय मुद्दों को उठाने के स्थान पर संसद के बहिष्कार पर जोर देना।
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कृपया जनता को ऐसी गाली मत दिजिये!

तो हो गया मतदाता का बुद्धिमत्तापूर्ण फैसला! यदि परम सम्माननीय टी.वी. चैनलों और अखबारों ने आप को सांस लेने की फुरसत दे दी हो तो अब हम आपका दम फुलाते हैं। आपके कुछेक मित्र ऐसे होंगे जो आपको राह चलते रोक कर पूछते होंगे, अरे हाँ फलां मामले में क्या हुआ?
 
प्रीतीश बारहठ
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एक छोटे राज्य का अनूठा रिकार्ड

पश्चिम बंगाल से सटे छोटे-से लेकिन खूबसूरत पर्वतीय राज्य सिक्किम में जब नवगठित विधानसभा की बैठक शुरू होगी तो सदन में विपक्ष की दीर्घा पूरी तरह खाली होगी. नहीं, विपक्ष ने सदन की कार्यवाही के बायकाट का फैसला नहीं किया है. दरअसल, अबकी राज्य में विपक्ष है
 
prabhakarmani
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भारत में काफ़्काइयत बदस्तूर जारी रहेगी: फ़्रांस्वाँ गातिए ध्यान दें !

चेक उपन्यास्कार फ़्रैन्ज़ काफ़्का (Franz kafka, 1852-1931) ने अपने उपन्यासों The Trial , The Castle , व The Metamorphosis में एक ऐसे विवेक भ्रष्ट समाज की रचना की है जहाँ सब कुछ नित्तांत बेतुका, अतार्किक, हास्यास्पद, खतरनाक और घोर अंधेरगर्दी के घटाटोप से
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यह तो भारतीय लोकतंत्र का चमत्कार है

यही भारतीय लोकतंत्र है, सभी गच्चा खा गए. खुशी की बात है कि महंगाई व आतंकवाद अब कोई मुद्दा नहीं रहे. शोराब्बुद्दीन के साथ साथ स्वीज बैंक भी खुश हो सकती है. एक अच्छी खबर जरूर है और वह है लाल झण्डों का कमजोर होना.
 
संजय बेंगाणी
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चुनाव

चुनाव भारत के लोकतंत्र का, क्या करूँ बखान,भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान,तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....मुँह उठाये फिर चले आये,छुटभैये, चमचों से पर्चे बटवाये,रंग-बिरंगे झण्डे फहराये,इक्के-दुक्के काम गिनवाये,मांग रहे हमसे मतदान, भोली जनता
 
SURINDER RATTI
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प्रधानमंत्री की कुर्सी ठुकरा दूंगा ! (कार्टून)

फिलहाल मैं अपने आप को प्रधानमंत्री पद के लायक नहीं समझता । अगर प्रधानमंत्री पद के लिए पेशकश की गई तो ठुकरा दूंगा । =>राहुल बाबा पहले तो इस चुनाव में यूपीए को ही बहुमत नहीं मिलने जा रहा है । फिर खुद यूपीए में ही दो दर्जन प्रधानमंत्री पद के दावेदार