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सृजनात्मक लेखन पर डॉ. गोपाल शर्मा : पाठ 1

बड़ी खराब आदत है मेरी - खुद लिखने से बचना और आसपास वालों को उपदेशियाना कि अमुक लिखिए , तमुक लिखिए. प्रो. दिलीप सिंह ने जब से बाकायदा एक लेख में अपने ढेर सारे लेखन का श्रेय मेरी इस आदत को दिया है कि पठान की मानिंद पीछे पड़ जाता हूँ, तब से ढेट और भी खुल
 
ऋषभ Rishabha
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मनु का उड़न खटोला

चित्र देखो, कहानी लिखोउदाहरण के लिए :-एक रविवार, भोजन के बाद जब मम्मी और पापा सो गएमैंने एक उड़न खटोला बनायाऔर डोडो को लिए उड़ चला, सूरज की ओरबादलों के ऊपर से होते हुए हमने पक्षियों से भी दोस्ती कीखाने को बहुत सारी मिठाइयाँ और पीने को शरबत;सारा बंदोबस्त
 
Pratik Ghosh
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भाई! अब कूदेगा भी?

एक दिन जब मम्मी-पापा घर पर नहीं थे....चित्रांकन- प्रतीक घोष
 
Pratik Ghosh
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सुंदर सुंदर सब्जियाँ तो मिलेंगी बुढापे में!

इस बार कई साल बाद ११ जनवरी को मैं अपने गृह-नगर खतौली में था. प्रो.देवराज भी संयोगवश मणिपुर से कुछ समय के लिए इन दिनों वहाँ आए हुए हैं. हम दोनों मिले तो १९८० से १९८३ की वे तमाम यादें ताज़ा हो आनी ही थीं जब हम दोनों पर तेवरी का जुनून हुआ करता था. तय हुआ कि
 
ऋषभ Rishabha
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अंतिम प्रणाम,जीजी

विमला जीजी [१९४६-२०१०] परमतत्व में विलीन हो गईं. माँ के जाने [२००५]के बाद से तो हम सब उन्हीं में माँ को देखने लगे थे. माँ ने ३० अगस्त को अंतिम साँस ली थी,जीजी ने ३० दिसंबर को. प्रकृति कैसे कैसे संयोग रचती है! बड़े भैया,जीजाजी और जीजी तीनों ही दुर्घटना
 
ऋषभ Rishabha
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प्रकाश की तरंगें छोड़तीं पदचिह्न

प्रकाश की तरंगें छोड़तीं पदचिह्न समय के खेत तक पहुँचा सकते हैं वे हमें लेकिन चलना तो हमें ही होगा किसान की तरह सधे कदमों से अपने खेत की मिट्टी की पुकार सुनते ही क्या तैयार हैं हम ?'' >>>>>>> देवराज
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