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मुला चिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है

एक्ठो रहें बड़े ओहदे वाले बड़का ब्लॉगर.. सो डिस्केशन डिस्केशन में उनका डिलेवर भी ब्लॉग-श्लॉग लिख लेने लगा रहा । उनकी काम वाली बाई भी कुछ कविताई की बेहयाई कर लेती रही, सो  वहू  ब्लॉगर को पकड़... -९९९- पूरा आलेख मूल ब्लॉगपृष्ठ पर पढ़ने हेतु शीर्षक पर
 
डा. अमर कुमार
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हिल्ले पठनीयता बहाने जन्मदिन

फ़िलहाल कुछ नहीं लिखने का मन था । अब  तो  एक धड़का और लग गया है, पठनीयता का !  भला बताइये, आपका निट्ठल्ला अपने टैग को सार्थक करने कहाँ जाये ?  मेरी पठनीयता  बिन सोचे ही आती है ! इधर उधर से पोस्ट उधार ले लेकर अच्छा ख़ासा
 
डा. अमर कुमार
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मैं मोटा क्यों हूँ...मैं मोटा क्यूँ हूँ ?

समीर भाई टिप्पणीशाह लालउड़नतश्तरीवाला कुछ लिखें, और हम कन्फ़्यूज़ियायें भी न ? ऎसा कम ही होता है.. ज़रूर कहीं कोई निहितार्थ रहा करता है । चतुर सुजान ऎंवेंई ही टाइम खोटी नहीं किया करते.. कुछेक जन ही ऎसे हैं, जिनकी पोस्ट मैं सहेज कर रख छोड़ता हूँ.. और 
 
डा. अमर कुमार