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क्या गांधी छोटी-छोटी लड़कियों के साथ सोते थे?(कनिष्क कश्यप की बक-बक)

आज अंतरजाल पर हिंदी की दुर्दशा का आलम यह है की आप अगर " बहन " या "दीदी " शब्द को गूगल पर खोजें तो सबसे पहले मस्तराम की कहानियों की लम्बी फेहरिश्त हीं आती है . यह सब कुछ निगरानी तंत्र और सरकार की नज़रों से छुपा तो नहीं है . फिर क्यों हिंदी को अपमानित किया
 
kanishka kashyap
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जीवन में दु:ख का भी स्वागत करें

मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह सुख तो चाहता है लेकिन दुख से हमेशा दूर भागने की कोशिश करता है किन्तु देखा जाए तो दुख की घड़ी में ही मनुष्य के आत्मबल.धैर्य. विवेक और जीवटता की असली परीक्षा होती है। यह दुख ही है. जो अपने और पराए की पहचान कराता है और
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आजादी के लिये लड़ने वाले दीवानों ने क्या इसी स्वतन्त्र भारत की कल्पना की थी?

आगामी 15 अगस्त को भारत को स्वतन्त्र हुये 63 वर्ष पूरे हो जायेंगे, इस दौरान स्वतन्त्र भारत की एक पीढ़ी अपने शैशव, युवावस्था को पूर्ण कर अपनी वृद्धावस्था में प्रवेश कर गयी। स्वातन्त्रय के इन वर्षों में हमने क्या खोया, क्या पाया, का विश्लेषण करना आज
 
रवीन्द्र प्रभात
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मृत्यु से अनुरोध

शरणाकांक्षी अंतर्मन आहात देहखंडित दीपच्युत नेहरह रहकर गिरता मनज्योति दण्डिततम सघन नयन स्थिल मेधा विकल प्रतीक्षारत विभा रवि विह्वलआलंबनाकांक्षा अलिंगनानुरोध श्वांस समर्पण जीवन प्रतिरोध पाप-पुण्य से दूरस्वर्ग-नर्क से इतर हो साथ तेरावही मार्ग प्रखरहो
 
Sudhir (सुधीर)
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विशिष्ट छवि का महत्व

प्रत्येक वस्तु, स्थान तथा व्यक्ति किसी न किसी व्यक्ति के लिये स्रोत का कार्य करता है जो उसकी किसी विशिष्ट आवश्यकता की आपूर्ति करता है, जिसके कारण वह व्यक्ति उस स्रोत के पास बार-बार जाता है। उपरोक्त तथ्य को उलट रूप में इस प्रकार कहा जा सकता है - लोगों
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सुना है कि खुदगर्ज दुआएँ मिलती नहीं

सुलग कर रह गया चाँद फलक पर, अंधियारी रातों में शोखियाँ चलती नहीं मांग लेता खुदा से मैं भी तुझको पर,सुना है कि खुदगर्ज दुआएँ मिलती नहीं क्या करता मैं नुमाइश इन ज़ख्मों कीमुर्दा-दिलों में टीस कोई उठती नहीं दौड़ना रही मजबूरी मेरी उम्र भर
 
Sudhir (सुधीर)
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आज भी भाव-विभोर कर देता है बाँस गीत

अशोक कुमार टंडन छत्तीसगढ के यदुवंशी कहे जाने वाले राउत समुदाय में प्रचलित बांस लोकवाद्य को फूंककर विशेष ध्वनि के साथ गीत एवं गाथा की प्रस्तुति बांस गीत की अद्भुत कला विलुप्तता के कगार पर पहुंच चुकी है । बावजूद इसके कहीं-कहीं अब भी इस कला की अभिव्यक्ति
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उन्माद सुख ....

अपने जन्मजात संस्कार और अभिरुचियों के अतिरिक्त अपने परिवेश में जीवन भर व्यक्ति जो देखता सुनता और समझता है उसीके अनुरूप किसी भी चीज के प्रति उसकी रूचि- अरुचि विकसित होती है..बचपन से ही नशेड़ियों को जिन अवस्थाओं में और व्यवहार के साथ मैंने देखा , इसके
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अच्छाई ओर बुराई

आज बहुत समय बाद चिंतन ले कर आया हुं, आशा करता हुं आप सब को पसंद आयेगा...हम सब इसी समाज से जुडे है, हम सब मै बहुत सी अच्छाईयां भी है ओर बुराईयां भी, लेकिन अगर हम इन दोनो के फ़र्क को समझ जाये तो कितना अच्छा हो... हम जब बुराई करते है बुरी बाते करते है तो हमे
 
राज भाटिय़ा
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अब तक का सारा इतिहास वर्ग संघर्ष का है- कार्ल मार्क्‍स

कार्ल मार्क्‍स के जन्मदिन पर विशेष फ्रेडरिक एंगेल्सविज्ञान के इतिहास में मार्क्‍स ने जिन महत्त्वपूर्ण बातों का पता लगाकर अपना नाम अमर किया है, उनमें से हम यहाँ दो का ही उल्लेख कर सकते हैं। पहली तो विश्व इतिहास की सम्पूर्ण धारणा में ही वह क्रान्ति है, जो
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कुछ कथाओं की अपूर्णता ही देती हैं तृप्ति ...

कुछ कथाओं की अपूर्णता ही देती हैं तृप्ति ... कौन जाने अन्यथा जीवन-पूर्णता भी क्या मुक्ति?स्वयं तराशता परिधियाँ अपनी  कामनाओं की उकेरता अदृश्य-खंडित सीमायें भावनाओं की हैं तो असंख्य आकांक्षाएं सहज समाधान की किन्तु दृष्टव्य
 
Sudhir (सुधीर)
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जाति व्यवस्था को खत्म देखना चाहते थे डा0 अम्बेडकर (जयंती पर विशेष)

डा0 अम्बेडकर का स्पष्ट मानना था कि राजनैतिक स्वतंत्रता से पूर्व सामाजिक एवं आर्थिक समानता जरूरी है। महात्मा गाँधी और डा0 अम्बेडकर दोनों ने ही जाति व्यवस्था की कुरीतियों को समाप्त करने की बात कही पर जहाँ डा0 अम्बेडकर का मानना था कि सम्पूर्ण जाति व्यवस्था
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खुजली का सुख

मानव शरीर में होने वाले व्याधियों में ऐसी कोई व्याधि नहीं जो कष्टकर न हो...परन्तु " खुजली " एक ऐसी व्याधि है जो त्वचा को भले लाख घात पहुंचाए पर खुजाने का स्वर्गिक सुख आनंद और तृप्ति का वह भली प्रकार कह सकता है जो कभी भी इस व्याधि के चपेट में आ चुका हो और
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गुमनाम सी मौत

कल जो मरा गली के नुक्कड़ पर,गुमनाम सी मौत,वो शायर ही होगा शायद....ताउम्र अहसासों की कुची सेरंग भरता रहा जिंदगी के,शफाक से कागजों पर...रंग ही न बचे उसकी -ज़िन्दगी के मुहाने पर कितनी सादगी से मौत ने
 
Sudhir (सुधीर)
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दिखावा.......

        सर्वप्रथम आप सभी को होली की ढेर सारी बधाइयाँ !!!! भारत ने पाकिस्तान को हॉकी में हराया अच्छा लगा ! इन सारी बातों के बीच न जाने क्यों मेरा मन अनायास ही पूर्व वर्ष में आई फिल्म चक दे इंडिया की तरफ जा रहा है !जी हाँ
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संत कबीर के दोहे-जहां विवाद होते हों, वहां न जायें

कबीर न तहां न जाइये, जहां जु नाना भाव। लागे ही फल ढहि पड़े, वाजै कोई कुबाव।। संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि वह कभी न जायें जहां नाना प्रकार के भाव हों। ऐसे लोगों से संपर्क न कर रखें जिनका कोई एक मत नहीं है। उनके संपर्क से के दुष्प्रभाव से हवा के एक
 
दीपक भारतदीप
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भौतिकता और मनुष्य

आज का मनुष्य भौतिक वादी है । वह इस भाग दौड की दुनिया मे ऐसा भागा जा रहा है कि वह अपने सारे रिश्ते नाते भूल गया है । सिर्फ पैसा ही उसका मकसद है । निःस्देह आज विज्ञान ने काफी उन्नति की है विज्ञान ने हमारे लिए क्या किया हैघ् निस्संदेह इसने भौतिक धरात्तल पर
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क्या कहता वो, बस रो पड़ा मेरा नाम लेकर

पूछा जो हाल-ए-दिल, साकी ने  दो जाम देकरक्या कहता वो, बस रो पड़ा मेरा नाम लेकर गम-ए-हिजरा में होती हैं ऐसी भी हैं अदाएं,बतियाते हैं वो, आईने से मेरा नाम लेकरहालात का मारा है शायद, होगा खौफज़दा भी,सुनाता है वो,
 
Sudhir (सुधीर)
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यथार्थ!!!

छीनता हो स्वत्व कोई, और तुम , त्याग तप से काम  लो यह पाप है ,पुण्य है, विछिन्न कर देना उसे , बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है!!!!          दिनकर की इन्ही पंक्तियों से सीख  लेने  की
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विमर्श...

 समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल ब्याध !जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध !!          अपने प्रिय कवि रामधारी सिंह "दिनकर"  की इन्हीं पंक्तियों से प्रेरणा लेते हुए मैंने तटस्थता का चोला अब
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छोटी छोटी खुशी के वो पल दो पल

Image by ~FreeBirD®~ via Flickrअब लाटरी चाहे चार डालर की लगे या चार रूपये की - पर मन तो खुश होता है ही. मेरे को भी याद है, कि जब हम बनारस के बड़ी पियरी मोहल्ले में रहा करते थे तो एक बार पापा ने मेरे नाम से २ रूपये की लाटरी खरीदी थी, और उसमें
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अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित,

मित्रों,कल अपने जन्मदिन पर कुछ क्षण ऐसे भी आये, जब चहुँ ओर की उल्लास और शोर शराबे के बीच मैं आत्म मनन में जुट गया - जीवन के बारे में सोचने लगा.
 
Sudhir (सुधीर)
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यह मध्यम-मध्यम चढ़ती जीवन बेला है

मित्रों, शांतनु ने  जब प्रातः काल भ्रमण में रूपसी  गंगा का ऐश्वर्य प्रथम बार देखा होगा तो उनके मन में क्या विचार उत्पन्न हुए होंगे...इसी कल्पना को
 
Sudhir (सुधीर)
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आज कल इस तरह के निश्छल व्यावहार की कितनी कमी सी है

Image via Wikipediaहमारे एक बंगलोर के ऑफिस के सहकर्मी इलाहाबाद से गया जाने के वक़्त - प्रोग्राम में कुछ बदलाव की वजह से सुबह से शाम तक के लिए अचानक बनारस पहुंचे. वो खुद थे, उनकी धर्मपत्नी और माता जी  भी उनके साथ थीं. करीब सुबह के वक़्त जब वो बस
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बचना वो हँसकर मिलता है दोनों बाहें फैलाएं

बचना वो हँसकर मिलता है दोनों बाहें फैलाएंमुश्किल में होगा न जाने कौन सा काम बताएचुनावी मौसम था, वादों की बयार में गुजर गयाआओ अब खुद सुलझाएं अपनी अपनी समस्याएँ  रही बाट जोहती शिक्षक की किनती सारी कक्षाएँ ट्युशन से पार लगेंगी इस साल की भी परीक्षाएं सच
 
Sudhir (सुधीर)
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आओ बनाएं "ऑल इंडिया एंटी-रेप फ्रंट"

टेनिस खिलाडी रुचिका गिरहोत्रा हत्या प्रकरण पर एक लेख पढ़ने के बाद मन में खयाल आया कि रुचिका जैसी हजारों बच्चियों को इंसाफ दिलाने के लिए क्यों न एक "ऑल इंडिया एंटी-रेप फ्रंट" बनाया जाए। इस कार्य को शिखर तक केवल ब्लॉगर जगत ही लेकर जा सकता है, क्योंकि आज
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जीसस के प्रवचनों में निहित अर्थों को समझें

क्रिसमस पर विशेष डॉ महेश परिमल पुस्तकें भेंट करना एक अच्छी परंपरा है। इसमें यदि कोई धर्मिक पुस्तक मिल जाए, तो मन श्द्धा्से भर उठता है। एक इसाई मित्र ने मुझे पवित्र बाइबल भेंट की। नया नियम और पुराना नियम, ये दोनों ही इसके दो रूप हैं। पूरी बाइबल पढ़ी, फ
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गीता किसी एक धर्म की जागीर नहीं

ख्यातिलब्ध जैन संत तरूण सागर का मानना है कि धर्म ग्रंथ गीता किसी एक धर्म की जागीर नहीं है और न ही उस परङ्क्षहदुओं का एकाधिकार है। श्री तरूण सागर ने कल यहां पत्रकारों से कहा कि गीता में कहीं भी ङ्क्षहदू का उल्लेख नहीं है। गीता पर सबका अधिकार है। उन्हो
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माँगा खुदा से अब न हो रहबर ज़माना मेरा

माँगा खुदा से अब  न हो रहबर ज़माना मेरा | बस हुआ संगदिल रहनुमाओं से दिल आजमाना मेरा || अपनी अपनी दूकान पर यहाँ सबके अपने रसूल, बिकते मजहब,  बिकती मुहब्बत और बिकते उसूल अश्कों को कीम
 
Sudhir (सुधीर)
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हुआ इश्क में रुस्वां, इक नई पहचान ढूंढता हूँ

मुसाफिर हूँ यारों, इक शहर अनजान ढूंढता हूँ हुआ इश्क में रुस्वां,  इक नई पहचान ढूंढता हूँ मजहब के वादों पर मरते  रोज़ इंसान देखता  हूँ बता दे जो खुदा को मेरा दर्द,  वो अजान ढूंढता हूँ दहशत मे
 
Sudhir (सुधीर)
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सब कुछ आपके अच्छे और भले के लिए ही हो रहा है.

कभी कभी हमें कुछ नहीं सोचना चाहिए. बस मन को शांत कर के कुछ ऐसा काम करना चाहिए - जो हम हमेशा से करना चाहते हैं. जैसे कोई किताब लिखना चाहता है, तो कोई कुछ जगहों पे घूमना चाहता है. तो किसी की ख्वाइश होती है, कि वो समाज सेवा करे, वगैरह-वगैरह. मेरे एक मित
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क्या आप भी तरसे हैं प्याली चाय को

पिछले दिनों एक लम्बी यात्रा के बाद इंदौर फिर वापिस आया, लेकिन इस तीन हजार किलोमीटर लम्बी रेलयात्रा में एक स्वादृष्टि चाय की प्याली को मेरे होंठ तरस गए। अगर आप चाय पीने के शौकीन हैं तो रेल सफर आपके लिए खुशनुमा नहीं हो सकता, हर रेलवे स्टेशन के आने से प
 
कुलवंत हैप्पी
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स्कूल नहीं जाती, क्योंकि उसको एड्स है

आज नीनू नौ साल की हो गई। आज वो आम बच्चों की तरह खेलती कूदती है, लेकिन स्कूल नहीं जाती, क्योंकि कोई उसको दाखिल नहीं देता, क्योंकि उसको एड्स है। इस बीमारी ने उसको जन्म से ही पकड़ लिया था, क्योंकि उसकी माँ इस बीमारी से पीड़ित थी, जब उसने अस्पताल में दम तो
 
कुलवंत हैप्पी
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संस्कारों की पूंजी जीवन भर साथ देती है

आज के अभिभावक अपने बच्चों को आगे बढाने के लिए तो हर संभव सुविधाएं प्रदान करते हैं लेकिन उन्हें मूल्य और संस्कार देने की तरफ उनका ध्यान कम ही होता है । एक समय था जब संयुक्त परिवारों की गहन परम्परा इस देश में रची बसी थी और हर बच्चा होश संभालने पर अपने
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हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!  जब एक कट-चाय समोसे से, हम यह दुनिया नापा करते थे, एक ख्याली धागे के दम पर, हम  हर सिस्टम बांधा करते थे यूँ तो हर बात फलसफे पर होती थी एक हम ही ज्ञानी-विज्ञानी थे  
 
Sudhir (सुधीर)
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डर से डरो मत उसका सामना करो

व्यक्ति के जीवन में भय अनादि काल से अनन्त रूपों में व्याप्त है । डर की हालांकि कोई शक्ल नहीं होती लेकिन अगर दुनिया की कोई सबसे भयानक और डरावनी चीज है, तो वह डर ही है । डर और असुरक्षा का बडा गहरा संबंध है बल्कि यह कहना चाहिए कि दोनों एक.दूसरे के पूरक
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सम्पाति-प्रलाप

यह रचना गत माह (टोलेडो) चिडियाघर में एक एकाकी गिद्ध को देखकर उत्पन्न हुई. मन में विचार उठा कि जटायु की मृत्यु का समाचार सुनकर सम्पाति के ह्रदय को क्या अनुभूति हुई होगी और परिणाम स्वरूप इन पंक्तियों &n
 
Sudhir (सुधीर)
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....एक घड़ी की मौत

राग तैलंग घर में दीवाल घड़ी का एक निश्चित स्थान हुआ करता था। उस एक बेजान घड़ी से घर के सजीवों और निर्जीवों के संबंध और कार्य-व्यवहार संचालित हुआ करते। आंखें घड़ी के उस स्थान को देखने की इतनी अभ्यस्त हो चुकी थीं कि उस एक दिन घड़ी को वहां न पाकर उनमें पानी
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सड़क पर हमारा व्यवहार

आज बहुत दिनो बात लिखने का मौका मिला है, चलो जी जित्ता हो सके निबटा लिया जाए। आजकल तो पढने लिखने का मौका ही मिलता, क्या करें, तीन तीन प्रोजेक्ट सर पर है, सबको निबटाना है। एक अकेली जान, हैरान परेशान क्या क्या करूं, इसलिए ब्लॉगिंग बैक बर्नर पर चली गयी ह
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मेरे सपनों में नहीं आते गांधी

कुछ दिन पहले एक ब्लॉग पढ़ रहा था, मैं ब्लॉगर के लेखन की बेहद तारीफ करता हूं क्योंकि असल में ही उसने एक शानदार लेख लिखा। मैं उस हर लेख की प्रशंसा करता हूं जो मुझे लिखने के लिए उत्साहित करता है या मेरे जेहन में कुछ सवाल छोड़ जाता है। लेखक के सपने में गां
 
कुलवंत हैप्पी
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