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क्या रेल दुर्घटना वास्तव में एक नक्सली हमला था , या कांग्रेस की योजना ?(कनिष्क की बकबक )

मोर को नाचता देख , यह समझ लेना कि रिमझिम फुहार बरसने वाली है , आज की पेंचीदा और सामाजिक , राजनितिक मनोविज्ञान के विकास पर पर प्रश्न चिन्ह होगा . वह मोर ट्रेनिंग कैम्प में तैयार किया गया भी हो सकता है , उसे ट्रेन किया गया है कि बेटा ! जब मैं बरसात करूँगा
 
kanishka kashyap
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भाजपा के अस्तित्व पर दस बड़े सवाल ! (कनिष्क की बक-बक )

हर दिन व्यवहार में हिंदुत्व का आधा चेहरा पश्चिमी लिबास , पश्चिमी भाव , पश्चिमी शैली , भूमंडलीय भाव पूरित, भूमण्डलीय मलाई चहकता नज़र आता है. जब विदेशी निवेश , डोलारिकरण पर , निर्यतिकरण पर , विदेशी मुद्रा भंदारिकरण पर सब कुछ निर्भर करता है तो उतेजित किया
 
kanishka kashyap
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भारत के मुसलमान क्या बहरे हो गये हैँ?

तेरह वर्ष की राधा का दिसंबर 2009 में अपहरण कर लिया गया था और अभी तक उसके ठिकाने के बारे में कोई खबर नहीं मिली है. राधा के पिता, मेहंगा राम ने कहा कि उन्होने हर चौखट पर अपनी गुहार लगाई, राष्ट्रपति से लेकर पंजाब के मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव तक को इस बात से
 
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लोकतंत्र का बलात्कार होना बचा रह गया था, कांग्रेस ने वह भी कर दिया !

अब तो फिल्म देखे बरसों हो गये; पर छात्र जीवन में ऐसा नहीं था। उस समय फिल्म में नायक-नायिका के साथ एक खलनायक भी होताContinue Reading »
 
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हिन्दू आतंकवाद के मायने !

भारत में स्वाधीनता के बाद भी अंग्रेजी कानून और मानसिकता जारी है। इसीलिए इस्लामी आतंकवाद के सामने हिन्दू आतंकवाद का शिगूफा कुछ कांग्रेसी नेता छेड़ रहे हैं। इसकी आड़ में वे उन हिन्दू संगठनों को लपेटने के चक्कर में हैं, जिनकी देशभक्ति तथा सेवा भावना पर
 
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क्या गांधी छोटी-छोटी लड़कियों के साथ सोते थे?(कनिष्क कश्यप की बक-बक)

आज अंतरजाल पर हिंदी की दुर्दशा का आलम यह है की आप अगर " बहन " या "दीदी " शब्द को गूगल पर खोजें तो सबसे पहले मस्तराम की कहानियों की लम्बी फेहरिश्त हीं आती है . यह सब कुछ निगरानी तंत्र और सरकार की नज़रों से छुपा तो नहीं है . फिर क्यों हिंदी को अपमानित किया
 
kanishka kashyap
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गुजरात दंगे बनाम मोदी

वर्ष 2002 के गुजरात दंगों का सच यह है कि इसमें 80 हिंदू 27 फरवरी से 30 अप्रैल तक पुलिस की गोली से मारे गए। इन दंगांे का विस्तार गुजरात के 25 जिलों में से मात्रा 12 जिलों में था। अहमदाबाद, मेहसाना, नरसीपुर, भावनगर, सूरत, दाहोद और बड़ोदरा जैसी जगहों में
 
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संवेदनाशून्य होती हिंदी पत्रकारिता

आज भी पत्रकारिता ’मिशनरी पत्रकारिता’ या ’लोककल्याणी’ पत्रकारिता' तो शायद नहीं रही है। गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा, व्यवसायीकरण, अखबारों पर उद्योगपतियों का कब्जा, पत्रकारिता के पीछे के छिपे निहित स्वार्थ, अखबारों व पत्रिकाओं को रोब गालिब करने, फायदा उठाने,
 
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