चराग़
चराग़वो जलते चराग़ बुझाता है,दिन में उजाले को डराता हैअपनी ज़िन्दगी की परवाह नहीं,मेरी सांसें रोज़ चुराता हैगै़रों को दोस्ती के पैग़ाम दिये, क्यूँ मुझ से दूरियाँ बनाता हैशीशा-ए-दिल को खिलौना समझा,हल्की सी चोट से टूट जाता हैकिस मिट्टी का बना है संगदिल,ख़ुद
Apr 27 2009 11:20 AM



Shuffle








