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ज़िकर दर्द का मैं ,कैसे कर दूँ ! जान , लफ्ज़ों के हवाले कर दूँ !मैं कोई पीर ,पैगम्बर तो नहीं ,जो सर काट , हथेली पे धर दूँ !ह़क नमक का, अदा करते हैं ,कैसे अश्कों मे, मिश्री भर दूँ !जा पहुँचे ,जो तेरे ख्यालों तक ,बता याद को , कोन से पर दूँ !
 
sanjeev kuralia