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उर्दू रामायण ,राममनोहर और भारतमाता ?

बन्दर नहीं बनाते घर , घूमा करते इधर-उधर, आ-कर करते खों-खों-खों ’रोटी हमे न देते क्यों ? ’ भान्जी और बिटिया के बचपन में यह कविता उनके बीच लोकप्रिय थी । बनारस स्टेशन के प्लैटफ़ोर्म की छत पर रात साढ़े ग्यारह बजे यह समूह सो रहा है – एक दूसरे को सहारा और
 
अफ़लातून
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बस दो कमरों की बात है... बन जाएंगे!

पिछले दिनों एक बार फिर मैं अपने लिए किराए का घर ढूंढने निकली। घर तो फाइनली मिल गया, लेकिन उसके साथ मुझे कई सबक भी मिले। पहले भी मैं कुछ सबक पा चुकी हूं। एक दोस्त ने मेरी कहानी सुनी तो सुझाया कि जो सबक मैंने सीखे हैं, उनसे बाकी लोगों को भी अवगत करा दूं
 
सोनिया वर्मा
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बस दो कमरों की बात है... बन जाएंगे!

पिछले दिनों एक बार फिर मैं अपने लिए किराए का घर ढूंढने निकली। घर तो फाइनली मिल गया, लेकिन उसके साथ मुझे कई सबक भी मिले। पहले भी मैं कुछ सबक पा चुकी हूं। एक दोस्त ने मेरी कहानी सुनी तो सुझाया कि जो सबक मैंने सीखे हैं, उनसे बाकी लोगों को भी अवगत करा दूं
 
सोनिया वर्मा
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यह सास-बहू का इंडिया है प्यारे

टीवी बदल रहा है। यह वाक्य शायद सही नहीं है। होना चाहिए, हम बदल रहे हैं। लेकिन सच तो यह है कि टीवी हमें बदल रहा है। इसकी मिसाल आपके सामने है, जिसकी तरफ अभी तक किसी ने गौर नहीं किया। सैटलाइट टीवी ने जब दूरदर्शन की जगह ली तो जल्द ही उसकी पहचान बने वे सी
 
संजय खाती
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बीवी पूछे, कहां देर हुई तो भड़किए मत...

इस अनुभव से तो हम सब गुजरते हैं कि हमने कहा कुछ और सामने वाले ने समझा कुछ और। फिर हम उसे सफाई देते रहते हैं कि मेरा मतलब ऐसा नहीं था...। इसी हफ्ते मैं एक वर्कशॉप से गुजरा। इसमें वैसे तो काम की बहुत सारी बातें थी, लेकिन खास तौर पर एक बात का जिक्र मैं
 
प्रणव प्रियदर्शी
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दिवाली

कई लोग इस दिवाली पर घर नहीं जा सकेंगे पर घर की याद तो आती ही है न ये कविता उन्ही लोगों के लिए है घर दिवाली आने वाली है तो जी किया कमरे साफ़ कर लूँ, सजा दूँ जैसे माँ किया करती है हर दिवाली पर... करीने से सजाती है गुलदान, परदे, चादरें, तकियों के खोल बदल
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आपके घर में किसकी चलती है?

यार तुम्हारे घर में किसकी चलती है?" "भाई सभी की चलती है। श्रीमती जी मुझे हड़काती हैं, मैं बच्चों को डाँट देता हूँ, बच्चे नौकर को चिल्ला देते हैं, नौकर कुत्ते को लात मार देता है। -------------------------------------------------------------------------
 
जी.के. अवधिया
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घर

शाम ढलते हीपंछी लौटते हैं अपने नीड़लोग अपने घरों कोबसों और ट्रेनों में बढ़ जाती है भीड़पर वो क्या करें जिनका घर हर साल ही बसता-उजड़ता हैयमुना की बाढ़ के साथ
 
mukti
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सत्रहवें फ़्लोर पर...

दो इमारतों के बीच ही सही सूरज दिखता तो है सा'ब उसकी लाली को चाय की प्याली और घरवाली के साथ अपनी जाली से देखकर ख़ुश हो लेना तारों भरा आसमान नहीं दिखेगा तो आसमान तो नहीं टूट पड़ेगा आपके पड़ोसी किसी स्टार से कम थोड़े ही हैं अब लाइफ़स्टाइल की नहीं स्टाइल
 
प्रबुद्ध
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मी घरी नाही

कशी ही रात्र गेली बंद डोळे पण झोप नाही. मी आहे घरी माझ्या मन माझे जगभर फिरून घरी आले पण मी घरी नाही.